लंकाकांड चौपाई (346-354)
लंकाकांड चौपाई (346-354) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन: नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।। बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।। इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा।। अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।। बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।। रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।। तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।। सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।। साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।। भावार्थ: जब रावण ने मंदोदरी की बात सुनकर उसे तीर के समान चुभने वाली लगी, तो वह सभा में जाकर सिंहासन पर बैठ गया। अहंकार में भरकर वह सब भय भूल गया। इधर भगवान श्रीराम ने अंगद को बुलाया। अंगद आए और चरणों में सिर नवाया। प्रभु ने प्रेम से पास बैठाकर हँसते हुए कहा — “हे बालि के पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। सच-सच बताओ, रावण जैसा पराक्रमी, जिसके बल की चर्चा पूरे संसार में है, उसके मुकुट तुमने चारों ओर कैसे उछाल दिए?” तब अंगद बोले — “हे सर्वज्ञ, शरणागतों को सुख देने वाले प्रभु!...