लंका काण्ड दोहा (38)
लंका काण्ड दोहा 38 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु।
कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
भावार्थ :
मंदोदरी रावण को समझाने का प्रयास करती है
हे रावण! आपके दो पुत्र मारे जा चुके हैं और आपकी लंका जलकर भस्म हो गई है, फिर भी आपकी बुद्धि अभी तक नहीं आई। अब भी अभिमान छोड़कर कृपासागर भगवान श्रीराम की शरण में जाएं और उनका निर्मल यश प्राप्त करें।
विस्तृत विवेचन :
यह दोहा श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आता है। यह रावण को समझाने के लिए कहा गया उपदेश है।
रावण की हठ और अहंकार
रावण के दो पुत्र (हनुमान के द्वारा अक्षय कुमार और अंगद द्वारा एक पुत्र) मारे जा चुके हैं। हनुमान जी ने लंका जला दी, फिर भी रावण का अहंकार नहीं टूटा।
अभी भी अवसर शेष है
मंदोदरी कहती है कि अभी भी समय है। यदि रावण चाहें तो श्रीराम की शरण में जाकर अपने पापों से मुक्त हो सकता है।
राम की करुणा
श्रीराम ‘कृपासिंधु’ हैं — करुणा के सागर। जो भी सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वे उसे स्वीकार कर लेते हैं।
जीवन का संदेश
यह दोहा हमें सिखाता है कि
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है
संकट आने पर ईश्वर की शरण ही सच्चा मार्ग है
समय रहते सुधर जाना ही बुद्धिमानी है
निष्कर्ष :
रावण के लिए यह चेतावनी थी कि विनाश से पहले ही वह श्रीराम की शरण जाए, लेकिन उसके अहंकार ने उसे डूबने से नहीं बचाया।
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