लंका काण्ड चौपाई (325-337)

 लंका काण्ड चौपाई ( 325-337)का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।।

रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।।

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।।

कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।।

रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।।

जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।।

अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।।

पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।।

बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।।

जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।।

भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।।

सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।।

सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।

भावार्थ :

मंदोदरी रावण को समझाती है कि वह अपनी गलत बुद्धि छोड़ दे और श्रीराम से युद्ध करने का विचार त्याग दे, क्योंकि राम के सामने उसकी शक्ति कुछ भी नहीं है। जिस राम का छोटा-सा सेवक हनुमान समुद्र लांघकर लंका आ गया, रक्षक मार डाले, वन उजाड़ दिया और पूरी नगरी जला दी – उसके स्वामी से युद्ध करना मूर्खता है।

वह रावण को राम की शक्ति की याद दिलाती है – जिन्होंने मारीच को मारा, शिव धनुष तोड़ा, देवताओं के पुत्रों को हराया और सूपर्णखा की दुर्गति की। फिर भी रावण को लज्जा नहीं आती।

विवेचन (संक्षेप में विस्तार)

यह चौपाई मंदोदरी द्वारा रावण को दिया गया उपदेश है। मंदोदरी एक विवेकशील, नीति जानने वाली स्त्री है। वह रावण को अहंकार छोड़ने की सीख देती है।

हनुमान की शक्ति का उदाहरण

मंदोदरी कहती है कि जिस राम का केवल एक दूत समुद्र पार कर लंका आ गया, रक्षक मार दिए और पूरी लंका जला दी, तो उसके स्वामी श्रीराम कितने पराक्रमी होंगे – यह सोचो।

राम की वीरता की याद

वह रावण को याद दिलाती है कि

राम ने मारीच को मारा

शिव धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया

देवताओं के पुत्रों को हराया

सूपर्णखा की दुर्दशा कर दी

रावण का अहंकार

सब जानते हुए भी रावण का घमंड नहीं टूटता। वह अपनी शक्ति पर अत्यधिक गर्व करता है और नीति-विवेक त्याग चुका है।

संदेश

यह चौपाई सिखाती है कि अहंकार विनाश का कारण बनता है और विवेक की बात न मानने वाला अंत में नष्ट हो जाता है। मंदोदरी नीति, धर्म और बुद्धि की प्रतीक है, जबकि रावण अहंकार और अधर्म का।


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