लंका काण्ड चौपाई (338-345)
लंकाकांड चौपाई (338-345) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।।
कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।।
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा।।
अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।।
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।।
अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।।
काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।।
निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।।
भावार्थ
जिस श्रीराम ने समुद्र पर सेतु बनवाकर अपनी वानर सेना सहित सहज ही लंका में प्रवेश किया,
जो करुणामय सूर्यवंश के भूषण हैं और जिन्होंने तुम्हारे कल्याण के लिए दूत (अंगद )भेजा,
जिसने सभा में तुम्हारे बल का नाश किया, जैसे सिंह हाथियों के समूह को तितर-बितर कर देता है।
जिनके अंगद और हनुमान जैसे पराक्रमी योद्धा सेवक हैं,
उन श्रीराम को तुम बार-बार साधारण मनुष्य क्यों कहते हो?
व्यर्थ ही अहंकार, ममता और मद में डूबे हो।
हाय! हे स्वामी! तुमने श्रीराम से विरोध करके विनाश को बुला लिया है।
काल के वश में होकर तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो गई है।
काल किसी को दंड लेकर मारता नहीं, बल्कि धर्म, बल, बुद्धि और विवेक हर लेता है।
जिसके पास काल आ जाता है, उसे भ्रम हो जाता है, जैसे तुम्हें हो रहा है।
विस्तृत विवेचन
यह चौपाई मंदोदरी द्वारा रावण को समझाने के प्रसंग की है। वह रावण को चेतावनी देती है कि—
श्रीराम की दिव्यता का वर्णन
श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं।
वे करुणा के सागर, सूर्यवंश के भूषण और अधर्म के नाशक हैं।
समुद्र पर सेतु बनाकर लंका पहुँचना उनकी अद्भुत शक्ति का प्रमाण है।
रावण के अहंकार पर प्रहार
हनुमान ने अकेले सभा में रावण की शक्ति को तुच्छ सिद्ध कर दिया।
अंगद जैसे वीर उनके सेवक हैं, जो रणभूमि में अजेय हैं।
फिर भी रावण श्रीराम को “नर” कहकर अपमान करता है — यह उसका घोर अज्ञान है।
काल का प्रभाव (विनाश का संकेत)
जब किसी का अंत समय निकट आता है, तब उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
काल स्वयं आकर नहीं मारता, बल्कि मनुष्य की विवेक शक्ति छीन लेता है।
रावण का राम-विरोध उसी विनाश का कारण बन गया है।
नीति-संदेश
अहंकार, मद और ममता मनुष्य का पतन कर देते हैं।
धर्म और विवेक से रहित शक्ति विनाश का कारण बनती है।
सज्जन का विरोध सदा अनर्थ को जन्म देता है।
निष्कर्ष
इस चौपाई में तुलसीदास जी ने मंदोदरी के मुख से यह सिखाया है कि
अहंकार में डूबा हुआ व्यक्ति अपने विनाश को स्वयं बुला लेता है।
रावण का राम-विरोध उसके पतन का मुख्य कारण बना।
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