लंका काण्ड दोहा (36)
लंका काण्ड दोहा 36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज।
पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।।
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ।
मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।(ख)।।
भावार्थ
(क)
शत्रुओं की सेना को पराजित कर बालीपुत्र अंगद अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके शरीर में रोमांच हो आया, आँखों में प्रेमाश्रु भर आए और वे भगवान श्रीराम के चरणकमलों में लीन हो गए।
(ख)
संध्या होने पर रावण रोता-बिलखता अपने भवन लौट गया। तब मंदोदरी ने उसे फिर समझाया और नीति की बात कही।
🔹 विस्तृत विवेचन
(क) अंगद की वीरता और भक्ति
इस दोहे में अंगद के पराक्रम और भक्ति – दोनों का सुंदर चित्रण है।
अंगद ने रावण की पूरी सभा और योद्धाओं को अपने बल से आतंकित कर दिया।
शत्रु-सेना को पराजित कर वे हर्ष से भर गए।
लेकिन यह हर्ष अहंकार का नहीं, रामभक्ति का हर्ष था।
उनके शरीर में पुलक (रोमांच) और आँखों में प्रेम के आँसू आ गए।
वे सारा श्रेय प्रभु श्रीराम को देकर उनके चरणों में मन अर्पित कर देते हैं।
यह दर्शाता है कि सच्चा वीर वही है जो जीत के बाद भी विनम्र और भक्त बना रहे।
(ख) रावण की हार और मंदोदरी की नीति
अंगद के पराक्रम से रावण अपमानित और भयभीत हो गया।
सभा में पराजय के बाद वह रोता-बिलखता अपने महल लौट गया।
मंदोदरी, जो विवेकशील और धर्मनिष्ठ स्त्री है, रावण को समझाती है कि –
राम से वैर छोड़ दो
सीता को लौटा दो
विनाश से बच जाओ
यहाँ मंदोदरी नीति और विवेक की प्रतीक हैं, जबकि रावण अहंकार का।
🔹 शिक्षा
भक्ति के साथ वीरता हो तो वही सच्चा बल है।
अहंकार विनाश का कारण बनता है, चाहे व्यक्ति कितना शक्तिशाली क्यों न हो।
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