लंका काण्ड चौपाई ((312-324)
लंका काण्ड चौपाई (312-324) का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।।
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।।
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।।
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।।
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।।
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।।
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।।
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।।
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।।
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।।
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।
भावार्थ
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।।
अंगद का अद्भुत बल देखकर राक्षसों के हृदय भय से भर गए। तब रावण स्वयं उठकर अंगद का पैर उठाने आया।
गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।।
अंगद रावण से कहता है – मेरे पैर पकड़ने से तुम्हारा तुम्हारा उद्धार नहीं होगा।
गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।।
अंगद ने उत्तर दिया – अरे मूर्ख! यदि राम के चरण नहीं पकड़ोगे तो उद्धार कैसे होगा? यह सुनकर रावण मन में लज्जित हुआ।
भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।।
रावण का तेज और वैभव सब नष्ट हो गया, जैसे दोपहर में चंद्रमा शोभा नहीं देता।
दार्शनिक विवेचन
जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।।
राम सम्पूर्ण जगत के प्राणस्वामी हैं। उनसे विमुख होकर कोई शांति कैसे पा सकता है?
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।।
हे उमा! राम के भौंह टेढ़ी करने मात्र से ही संसार का नाश हो सकता है।
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।।
जो तिनके को वज्र और वज्र को तिनका बना दे, उसके दूत से भला कौन बच सकता है?
🔹 नीति और युद्ध संकेत
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।।
अंगद ने नीति और धर्म की बातें समझाईं, पर रावण ने नहीं माना — उसका अंत निकट था।
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।।
अंगद ने शत्रु का घमंड तोड़कर प्रभु राम का यश सुनाया और लौट गया।
🔹 रावण की प्रतिक्रिया
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।।
अंगद क्रोध में बोला – अभी ही तुझे मार दूँ, किस बात की बड़ाई करूं।
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।।
पहले ही बालि के पुत्र अंगद ने रावण के पुत्र को मार दिया था,यह सुनकर रावण भय और दुःख से व्याकुल हुआ।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।
अंगद का पराक्रम देखकर सभी राक्षस विशेष रूप से भयभीत हो गए।
🔹 समग्र विवेचन
यह प्रसंग अंगद के अद्भुत पराक्रम, नीति-बोध और राम-भक्ति का प्रतीक है।
यहाँ रावण का अहंकार चूर होता है और उसकी पराजय का संकेत मिलता है।
अंगद केवल योद्धा नहीं, बल्कि धर्म और नीति के प्रतिनिधि दूत हैं।
रावण का तेज, वैभव और अभिमान सब नष्ट हो चुका है – यह उसके अंत का संकेत है।
Comments
Post a Comment