लंका काण्ड (दोहा 1)
लंका काण्ड दोहा 1 का भावार्थ
सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥
भावार्थ
चाहे वह एक लम्हा (लव, निमेष, परमाणु—बहुत छोटा समय) ही क्यों न हो या युग-वर्ष-कल्प जैसे बहुत बड़े समय तक — यदि मन से तुम राम का स्मरण/भजन नहीं करते, तो उन सभी कालों का कोई मूल्य नहीं। अर्थात् राम का संयोग (एक क्षण भी) न होने पर लंबी आयु/काल का क्या लाभ — भक्ति ही सर्वोच्च है।
विस्तृत विवेचन
1. शब्दार्थ (लाइन-बाई-लाइन्):
लव, निमेष, परमानु — बहुत-अत्यंत लघु समय के सूचक (लव = एक क्षण; निमेष = पलक झपकना; परमानु = अति सूक्ष्म/एक क्षुद्र इकाई)।
जुग, बरष, कलप — बहुत लम्बे काल (युग = बड़ी अवधि; वर्ष = साल; कल्प = ब्रह्म का दिन — असंख्य समय)।
सर चंड — यहाँ का अर्थ है अतिशय काल/अत्यधिक संचयी समय (कविता में ‘बहुत-बहुत समय’ का संकेत)।
भजसि न मन तेहि राम को — उस अवधि में भी यदि मन से तुम राम की भक्ति/स्मरण नहीं करते।
कालु जासु कोदंड — काव्यात्मक रूपक; ‘कोदंड’—राम का धनुष। यहाँ अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि मृत्यु-काल या समय के समक्ष (काल के सामने) धनुष (बल, वैभव) भी काम न आए; अर्थात् भक्ति के बिना सब वैभव, आयु और धर्मिक कर्म नाकाफी हैं।
2. काव्य-रचना और रूपक:
कवि ने सूक्ष्म (लव–निमेष) से लेकर विराट (जुग–कल्प) तक समय-श्रेणियाँ एक साथ रखकर यह दिखाया कि भक्ति के सापेक्ष समय की सीमा बेअसर है — भक्ति यदि है तो छोटा समय पर्याप्त; यदि नहीं — तो बड़ा समय भी व्यर्थ।
‘कोदंड’ का प्रयोग राम-रूप के शौर्य का स्मरण कराता है और यह भी बताता है कि राम का स्मरण शत्रु, मृत्यु, समय — सब पर विजय कर देता है; पर अगर स्मरण नहीं होगा तो राम के धनुष का वैज्ञानिक/लौकिक बल भी काम नहीं आता।
3. दार्शनिक-आधार (अर्थात् तात्त्विक संदेश):
यह दोहा भक्ति मार्ग की प्रधानता पर जोर देता है — ‘समय’ का मोल भक्ति के समक्ष नगण्य है।
आत्मानुशोधन: जीवन का लक्ष्य केवल दीर्घायु या बाह्य संचित वस्तुएँ नहीं; मन का राम-स्मरण ही सार है।
मोक्ष/उद्धार का आधार निरपेक्ष कर्म नहीं, बल्कि हृदय-निवास में राम की उपस्थिति है।
4. भावनात्मक-प्रभाव:
अल्पोक्ति में तीव्र तैयारी: कवि ने संक्षिप्त पंक्तियों में हृदय को झकझोरने वाला कथन रखा है — पाठक/श्रेष्ट को सोचने पर मजबूर कर देता है।
भक्तिमार्ग के अनुयायी के लिए यह उत्साहवर्धक और हृदयस्पर्शी दोनों है: एक पल की भक्ति भी परमलाभ दे सकती है।
5. आचरणिक पाठ (प्रयोग):
व्यवहार में संदेश: रोज़ाना थोड़े-से समय के लिए भी यदि ईमानदारी से राम का स्मरण, नामस्मरण, पाठ या ध्यान किया जाए—वह मूल्यवान है।
किसी बड़े आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए प्रतीक्षा की ज़रूरत नहीं — छोटे-छोटे क्षणों का समर्पण ही परिवर्तन लाता है।
6. सांस्कृतिक/धार्मिक सन्दर्भ:
तुलसीदास और भक्ति परंपरा में अक्सर यही सिखाया जाता है — नाना प्रकार के कर्मों से अधिक हृदय की भक्ति महत्त्व रखती है। यह दोहा उसी परम्परा की संक्षिप्त और तीक्ष्ण अभिव्यक्ति है।
संक्षेप में: काव्य यह कहता है — समय छोटा हो या बड़ा, भक्ति न हो तो सब व्यर्थ; एक क्षण का सच्चा राम-समर्पण अनंत सुख/मुक्ति से श्रेष्ठ है।
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