लंका काण्ड दोहा (10)

लंका काण्ड दोहा 10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि।

नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि।।9।।

भावार्थ (सार)

प्रहस्त कह रहा है:अगर प्रतिपक्ष (यहाँ संदर्भ में — सीता को लेकर) वापस लौट जाएँ तो फिजूल का झगड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं। परन्तु अगर वे लौटने की नीयत ही न रखें, तो तब खुले युद्ध में दृढ़ता और कठोरता से उन्हें हराइए — कोई नरमी मत दिखाइए। (संदर्भ: लंका-काण्ड के वार्तालाप/सलाह-संदर्भ)। 

विस्तृत विवेचन — क्या कहा जा रहा है और क्यों महत्वपूर्ण है

1. परिस्थिति का निर्णयात्मक सुझाव: दोहे में एक स्पष्ट विकल्प रखा गया है — शांति (यदि विरोधी पलटे) या युद्ध (यदि नहीं पलटे)। यह नीति-निर्देशक (statesmanlike) सलाह है: पहले सामरिक समाधान की कोशिश करो, अगर वह संभव नहीं तो पुरा युद्ध करो। 

2. भाषा और लहजा:

शब्द जैसे नारि पाइ फिरि जाहिं सीधे-सीधे घटना (सीता प्राप्ति/वापसी) पर निर्भरता दिखाते हैं।

न बढ़ाइअ रारि — ‘रारि’ = वैर/विरोध; यहाँ अनावश्यक वैर बढ़ाने की निंदा है।

सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि — सशक्ति, दृढ, और कठोर कार्रवाई का आदेश; तात संबोधन का तीव्र स्वर (जैसे “हे पुत्र/सखा” — पर यहाँ आदेश देने का भाव)।

3. नैतिक/नीति संबंधी सीख: यह नीति-ज्ञान सिखाती है कि पहले समझौते का रास्ता अपनाओ; अगर समझौता संभव न हो तो युद्ध के लिए पूरी तैयारी और दृढ़ निश्चय रखो — दोहरे व्यवहार (soft when possible, hard when necessary)।

4. संदर्भ (कथा में): यह दोहा प्रहस्त के सलाह सन्दर्भ में आता है —  प्रहस्त रावण से कहते हैं कि सीता को लेकर यदि सम्मानपूर्वक मामला सुलझ जाता है तो झगड़ा बढ़ाने की जरुरत नहीं; वरना युद्ध के लिए कड़ा रुख अपनाओ। यानी यह संदेश नीति और परिपक्व निर्णय का है। 

साहित्यिक बिंदु :

यह दोहा है — सरल, त्वरित निर्णायक श्लोक जो नीति का सार कहता है।

विरोध/शांति के बीच द्वैधता (binary choice) की रचना है — क्लियर कंडीशनल (यदि — नहीं तो)।

भाव कठोर पर व्यावहारिक: नीति और परिणाम दोनों की तालमेल करती पंक्तियाँ।

संक्षेप (Takeaway)

पहले शांति और समझौते की आशा रखें; अगर वह संभव नहीं है, तो सशक्त और दृढ़ होकर युद्ध (या निर्णायक कार्रवाई) करें — टिके रहो और पस्त न हो।


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