लंका काण्ड चौपाई में (100-109)
लंका काण्ड चौपाई 100--109 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी।
परम प्रताप तेज बल रासी।।
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी।
ससि केसरी गगन बन चारी।।
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा।
निसि सुंदरी केर सिंगारा।।
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई।
कहहु काह निज निज मति भाई।।
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई।
ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।।
मारेउ राहु ससिहि कह कोई।
उर महँ परी स्यामता सोई।।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा।
सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।।
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं।
तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा।
अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।।
बिष संजुत कर निकर पसारी।
जारत बिरहवंत नर नारी।।
भावार्थ
राम जी रात के समय शिविर में बैठे हैं और रात का दृश्य वर्णित है।
पूर्व दिशा के पर्वत-गुफाओं में रहने वाले सिंह आकाश में दौड़ते चंद्रमा को देखकर गर्जन कर रहे हैं। उनका गर्जन ऐसा है जैसे मदमस्त हाथियों के मस्तक फाड़ देने की शक्ति हो।
आकाश में तारे डरे-सहमे से दौड़ते प्रतीत होते हैं, मानो रात्रि की सुंदरियाँ अपने सिंगार में व्यस्त हों। उसी समय चंद्रमा के मध्य में काला दाग दिखाई देता है। भगवान श्री राम ने लक्ष्मण और सुग्रीव से पूछा—
“चंद्रमा में यह कालापन किस कारण दिख रहा है?”
विवेचन
सुग्रीव आदरपूर्वक कहते हैं—
1. चंद्रमा में पृथ्वी की छाया
यह पृथ्वी की छाया चंद्रमा में दिखाई पड़ती है। किसी-किसी का मत है कि राहु ने चंद्रमा को मारा है इसलिए यह दाग दिख रहा है।
2. कामदेव के मुख का भाग
कुछ कहते हैं कि जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया तो उसके मुख का सार भाग चंद्रमा में बस गया और वही काला चिन्ह है।
3. चंद्रमा के हृदय का छिद्र
कहते हैं कि चंद्रमा के हृदय में छोटा सा छिद्र है, उसी से यह प्रकट है।
4. भगवान श्रीराम का दिव्य उत्तर
भगवान कहते हैं— चंद्रमा ने अपने प्रियबंधु सर्पों (नागों) का विष अपने हृदय में रख लिया है। वही विष उसके हृदय पर काले दाग के रूप में दिखाई देता है।
वह विष विरह से तड़पते हुए पुरुष-नारी के हृदय में अग्नि बनकर जलन उत्पन्न करता है।
आध्यात्मिक संदेश
बिन्दु अर्थ
चंद्रमा का काला दाग संसार में कोई भी वस्तु पूर्ण नहीं, अपूर्णता ही वास्तविक सौंदर्य है
विष का प्रभाव प्रेम और विरह दोनों जीवन में आवश्यक अनुभूति हैं
राम का उत्तर परम सत्य भावात्मक और अनुभूति से समझा जाता है, मात्र तर्क से नहीं
सार
तुलसीदासजी इस दृश्य से बताते हैं कि प्रकृति का प्रत्येक दृश्य ईश्वर का संकेत और रस है।चंद्रमा का दाग केवल वैज्ञानिक विषय नहीं बल्कि विरह, प्रेम और जीवन की वास्तविकता का प्रतीक है।
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