लंका काण्ड दोहा (2)

 लंका काण्ड दोहा 2 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ।

आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ।।1।।

भावार्थ :

वानर सेना के सभी वीर पर्वतों और बड़े-बड़े वृक्षों को खेल-खेल में (बहुत सहजता से) उखाड़कर लाते हैं और उन्हें नल-नील को सौंप देते हैं। नल और नील उन पर्वतों और वृक्षों को समुद्र में डालकर भगवान श्रीराम के लिए सेतु (पुल) का निर्माण करते हैं

विस्तृत विवेचन :

यह दोहा लंका काण्ड में उस प्रसंग का वर्णन करता है जब श्रीराम जी के आदेश से वानर सेना समुद्र पर पुल बनाने का कार्य प्रारंभ करती है। भगवान ने नल और नील को यह कार्य सौंपा क्योंकि उन्हें वरदान था कि उनके द्वारा जल में फेंका गया कोई भी पत्थर डूबेगा नहीं।

वानरगण बड़े उत्साह से चारों दिशाओं में जाकर विशाल पर्वत, शिखर और वृक्ष उखाड़ लाते हैं। तुलसीदास जी ने यहाँ वानरों की शक्ति और उनकी सेवा भावना का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है — वे इस कार्य को “लीला” (खेल) की तरह करते हैं।

यह प्रसंग भक्ति और सहयोग की भावना का प्रतीक है। सभी वानर अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रभुकार्य में लगे हैं। इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि जब मनुष्य मिलकर कार्य करता है, तो समुद्र जैसे बड़े-बड़े अवरोध भी पार किए जा सकते हैं।

संक्षेप में सार:

यह दोहा भक्तों के उत्साह, सामूहिक परिश्रम और प्रभुकार्य की महिमा का वर्णन करता है — जहाँ हर कोई अपने सामर्थ्य से ईश्वर की सेवा करता है।


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