लंका काण्ड चौपाई (28-36)

 लंका काण्ड चौपाई 28-36 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:-

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।।

चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।।

सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।।

देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।।

मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।।

अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।।

प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे।।

तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।।

चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।।

भावार्थ (सरल शब्दों में)

वानरों ने सेतु को बहुत मजबूत बाँध दिया, जिसे देखकर करुणा के सागर भगवान राम का मन अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। विशाल वानर सेना गर्जना करते हुए आगे बढ़ी। रामचंद्रजी सेतु के पास चढ़कर समुद्र की विशालता देखने लगे। भगवान की करुणा से समुद्र के सभी जलचर (मछलियाँ, मगर, साँप आदि) ऊपर आकर उनके दर्शन करने लगे। कुछ जलचर अत्यन्त विशाल थे, जो सात योजन तक लम्बे थे — कुछ ऐसे थे जो दूसरों को खा जाते थे और कुछ उन्हें देखकर भी भयभीत रहते थे। लेकिन भगवान राम के दर्शन से कोई भी उन्हें हटाना नहीं चाहता था। सबके मन प्रसन्न हो गए। जलचर भगवान की छवि में मग्न हो गए और पानी के भीतर भी उन्हें देखना नहीं चाहते थे। राम की आज्ञा पाकर विशाल वानर सेना आगे बढ़ चली, जिसका वर्णन कोई नहीं कर सकता।

विस्तृत विवेचन (गहराई से)

1. सेतु का पूर्ण होना और राम का आनंद

‘बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा।’

वानरों ने नल-नील के मार्गदर्शन में अत्यन्त मजबूत और विशाल पुल तैयार कर दिया। इसे देखकर भगवान राम का हृदय प्रसन्नता और गर्व से भर गया।

यहाँ कृपानिधि का प्रयोग बताता है कि राम हर हाल में करुणामयी हैं—सेतु उनकी कृतज्ञता और भक्त-प्रेम का प्रतीक है।

2. वानर सेना का उत्साह

‘चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जहिं मर्कट भट समुदाई।’

वानरों की सेना इतनी विशाल और उत्साहित थी कि उसका वर्णन करना भी असंभव है। वे युद्ध के उत्साह में सिंह जैसी गर्जना कर रहे थे।

यह दृश्य राम-सेना के जोश और दैत्यों के विनाश के संकल्प को दिखाता है।

3. राम का सेतु पर चढ़कर समुद्र दर्शन करना

‘सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई।’

भगवान राम सेतु के समीप चढ़कर समुद्र की अनंतता को देखते हैं।

यह दृश्य दर्शाता है कि राम किसी भी कार्य के पहले उसका पूर्ण अवलोकन करते हैं, यह उनके नेतृत्व गुण को भी दिखाता है।

4. भगवान के दर्शन को आतुर समुद्री जीव

‘देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा।’

भगवान की करुणा देखकर समुद्र के जलचर—मछलियाँ, मगर, साँप, जल-जीव—सब के सब ऊपर आ जाते हैं।

यह दृश्य अत्यन्त अद्भुत है—प्रकृति भी प्रभु के दर्शन को तरसती है।

5. जलचरों का वर्णन

‘मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला।'

कविवर तुलसीदास बताते हैं कि समुद्र में तरह-तरह के अगणित बड़े-बड़े प्राणी थे। कुछ तो सात योजन (~56 km) तक लम्बे थे।

यह समुद्र की अगाधता और प्राकृतिक सौंदर्य का अलंकारिक वर्णन है।

6. भय और शक्ति का खेल, पर राम के आगे सब नत

‘अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं।’

कुछ जलचर ऐसे थे जो दूसरों को खा जाते थे, और कुछ उन हिंसक प्राणियों के डर से डरते थे।

लेकिन…

‘प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे।’

भगवान राम को निहारने से कोई किसी को नहीं घेरता।

राम का दर्शन हिंसा को भी रोक देता है—

यह बताता है कि राम का दर्शन भय, द्वेष और हिंसा को शांत कर देता है।

7. भगवान के रूप में मग्न जलचर

‘तिन्ह की ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी।’

जलचर पानी के भीतर जाकर राम के दर्शन से वंचित नहीं होना चाहते, इसलिए ऊपर ही रुक जाते हैं।

वे प्रभु की छवि में पूरी तरह मग्न हो जाते हैं।

यह प्राकृतिक जगत की राम में भक्ति का चरम रूप है।

8. राम की आज्ञा से कटक (सेना) प्रस्थान

‘चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई।’

राम की आज्ञा मिलते ही विशाल वानर सेना लंका की ओर बढ़ती है।

यह दृश्य बताता है—

संगठन

अनुशासन

और युद्ध के संकल्प का चरम

वानरों की सेना इतनी विशाल थी कि उसका संपूर्ण वर्णन कवि भी नहीं कर सकता।

निष्कर्ष

यह पूरा प्रसंग राम की करुणा, सेतु निर्माण की सफलता, सेना का उत्साह, और प्रकृति का राम में भक्ति भाव का अद्भुत चित्रण है।

तुलसीदास यह दिखाते हैं कि जब प्रभु स्वयं मार्ग पर हो, तब प्रकृति भी उनका अनुसरण करने लगता है और भक्ति से परिपूर्ण हो उठती है।

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