लंका काण्ड दोहा (3)

 लंका काण्ड दोहा 3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।

ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास।।2।।

भावार्थ:

जो शिव से द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्न में भी मुझे नहीं पाता। शंकरजी से विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है।

जिनको शंकरजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं एवं जो शिवजी के द्रोही हैं और मेरे दास (बनना चाहते) हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरक में निवास करते हैं ।

विस्तृत विवेचन:

भगवान राम ने अपने और भगवान शिव के बीच भेदभाव रखने वाले को घोर नरक में निवास करने के बारे में कहा है। उन्होंने कहा स्पष्ट कर दिया है कि दोनों के बीच कोई भेद नहीं है और वे एक हीं परब्रह्म के दो स्वरूप हैं।

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