लंका काण्ड चौपाई (37-46)

 लंका काण्ड चौपाई 37-46 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।

सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।।

सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।।

खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।।

सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।।

खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।।

जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।।

दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।।

जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।।

सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।।

भावार्थ (संक्षेप में)

बन्दर और भालू के कर्तव्य  देखकर बड़े प्रसन्न हुए। पूरी वानर सेना सहित वे समुद्र पार उतरकर लंका के सामने डेरा डालते हैं। श्रीराम सभी वानरों-भालुओं को फल–मूल खाने का आदेश देते हैं। वानर पेड़ों को झकझोरकर फल खाते और लंका की ओर पर्वत-शिखर उखाड़कर फेंकते हैं। जहाँ-जहाँ राक्षस मिलते, वानर उन्हें पकड़कर नाक-कान काटकर भगा देते। वे घायल राक्षस जाकर रावण को सबकुछ बताते। यह सुन रावण क्रोधित होकर समुद्रबंध तोड़ने की धमकी देता है।

🌼 विस्तृत विवेचन

1️⃣ अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई।।

दोनों भाई (राम–लक्ष्मण) बन्दर और भालू की करतूतों को देखकर हंसते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं।

भक्ति में यहाँ संकेत है कि “सेवक का कार्य देखकर स्वामी का हृदय प्रसन्न होता हैं।

2️⃣ सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा।।

भगवान राम पूरी सेना सहित समुद्र पार उतर गए।

वानर-सेना का उत्साह और बल वर्णन से परे था।

यह दर्शाता है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो, तो सेना का मनोबल पर्वत समान होता है।

3️⃣ सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।।

समुद्र पार करके श्रीराम ने अपना शिविर बनाया।

फिर वानरों को आदेश दिया —

“जाकर फल-मूल खाओ, अपनी शक्ति बनाकर रखो।”

4️⃣ खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए।।

वानर–भालू तुरंत हर दिशा में दौड़ पड़े।

यहाँ सेना की फुर्ती और अनुशासन दिखाया गया है।

5️⃣ सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी।।

सभी पेड़ ऋतु और समय के बिना  राम के हित में फल देते हैं।

उन्होंने ऋतु, समय, नियम का विचार तक नहीं किया, क्योंकि

राम-कार्य सर्वोपरि है।

6️⃣ खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं।।

वे पेड़ों को हिला–हिलाकर फल खाते,

और पूरी-पूरी पर्वत-चोटियाँ उखाड़कर लंका की ओर फेंकते जाते।

यह आने वाले युद्ध की तैयारी का दिग्दर्शन है।

7️⃣ जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं।।

जहाँ भी घूमते हुए राक्षस मिल जाते,

वानर उन्हें घेरकर धूल चटा देते ― मारते, नचाते, डराते।

राक्षसों के मन में भय बैठा दिया गया।

8️⃣ दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना।।

वानरों ने राक्षसों की नाक-कान काटकर

उन्हें यह भी कहा —

“अब जाकर प्रभु राम की महिमा बताना।”

यह राम की मर्यादा की सेना है, जो युद्ध होने से पहले शत्रु को चेतावनी देती है।

9️⃣ जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता।।

जिन राक्षसों के नाक-कान काटे गए,

वे जाकर रावण को पूरी घटना बताते हैं —

वानरों की विशाल सेना, उनका उत्साह, उनकी शक्ति, और राम का प्रभाव।

🔟 सुनत श्रवन बारिधि बंधाना। दस मुख बोलि उठा अकुलाना।।

इन खबरों को सुनकर रावण चिंतित हो उठा।

उसने क्रोध में समुद्रबंध (सेतु) को तोड़ देने की बात कही।

यह रावण की अस्थिर बुद्धि और भय को दर्शाता है।

🌟 सार

इन चौपाइयों में श्रीराम की सेना के उत्साह, वीरता, अनुशासन और तैयारी का चित्रण है।

राक्षसों में भय फैल चुका है और रावण की चिंता बढ़ रही है।

यह प्रसंग राम–रावण युद्ध से ठीक पहले की हलचल और माहौल को जीवंत करता है।


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