लंका काण्ड दोहा (4)

 लंका काण्ड दोहा 4 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।

ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन।। (लंका काण्ड, दोहा 3)

भावार्थ –

श्रीरामचंद्र जी के प्रताप से पत्थर भी समुद्र पार कर गए, अर्थात् निर्जीव वस्तुएँ भी उनके नाम से तैर गईं। ऐसे में जो मूर्ख लोग भगवान श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की उपासना करते हैं, वे निश्चय ही अज्ञानी हैं।

विस्तृत विवेचन –

इस दोहे में तुलसीदासजी ने भगवान श्रीराम के नाम और उनके प्रताप की महिमा का वर्णन किया है।

1. जब सेतुबंध के समय नल-नील पत्थरों पर "राम" नाम लिखते थे, तो वे पत्थर जल में डूबने के बजाय तैर जाते थे। यह घटना यह सिद्ध करती है कि रामनाम में स्वयं भगवान की शक्ति निहित है।

2. कवि कहते हैं — जो लोग इतने प्रत्यक्ष प्रमाण के बाद भी श्रीराम को छोड़कर अन्य देवताओं की आराधना करते हैं, वे मति से मन्द (अर्थात् बुद्धिहीन) हैं। क्योंकि जो भगवान पत्थरों को पार करा सकते हैं, वे ही संसार-सागर से जीवों को पार कराने में समर्थ हैं।

निष्कर्ष –

यह दोहा राम-भक्ति की सर्वोच्चता को प्रकट करता है। तुलसीदासजी के अनुसार, श्रीराम ही मोक्ष और कल्याण के एकमात्र साधन हैं।

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