लंका काण्ड दोहा (5)

 लंका काण्ड दोहा 5 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।

अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं।।4।।

भावार्थ :

सेतु बन जाने पर वहाँ बहुत भीड़ हो गई। वानर सेना आकाश मार्ग में उड़ते जा रहे हैं और जलचर (मछलियाँ, कछुए आदि) भी सेतु पर चढ़-चढ़कर समुद्र पार कर रहे हैं।

विस्तृत विवेचन

इस दोहे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामसेतु बनने के बाद की अद्भुत और अद्वितीय स्थिति का वर्णन किया है।

१. ‘सेतुबंध भइ भीर अति’

सेतु बनते ही वहाँ अपार भीड़ लग गई। करोड़ों वानर, भालू, सैनिक—सब एकत्र होकर लंका की दिशा में पार करने को उत्सुक थे। समुद्र के ऊपर बना सेतु सबको अत्यंत आकर्षक लगा।

यह भीड़ केवल स्थलीय जीवों की ही नहीं थी, बल्कि आकाश में उड़ने वाले देवगण भी इसे देखने के लिए उपस्थित थे।

२. ‘कपि नभ पंथ उड़ाहिं’

वानर सेना अपनी शक्ति से आकाश में कूदते, फाँदते, उड़ते हुए लंका की ओर चल रही थी।

यह दृश्य उनकी शक्ति, उमंग, उत्साह और युद्ध की आतुरता को दिखाता है।

अनेक वानर तो सेतु का प्रयोग ही नहीं कर रहे, वे आकाश मार्ग से ही जा रहे हैं।

३. ‘अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं’

यह पंक्ति अत्यंत सुंदर और अद्भुत है।

जो जीव समुद्र में रहते हैं—मछलियाँ, मगर, कच्छप, समुद्री जीव—वे भी सेतु पर चढ़-चढ़कर समुद्र के पार जा रहे हैं।

इसका अर्थ यह भी है कि सेतु अब सबके लिए खुला मार्ग बन गया।

राम के कारण निर्जीव पत्थर भी पवित्र हुए और जीव-जंतु भी इस सेतु का लाभ लेने लगे।

४. आध्यात्मिक संकेत

‘सेतु’ का अर्थ है—संयोग, जोड़ने वाला मार्ग।

भगवान राम का मार्ग जन-जन, जीव-जंतु, सभी के लिए खुला है।

जो भी उनके समीप आता है, उसे पार होने का मार्ग मिल जाता है।

यह सेतु केवल लंका पार करने का नहीं, बल्कि संसार-सागर से मुक्ति दिलाने का भी प्रतीक है।

समापन

यह दोहा राम सेतु की महिमा, वानरों के जोश और प्रकृति के सभी जीवों पर रामकृपा का अत्यंत मनोहर वर्णन है।

तुलसीदास जी बताते हैं कि प्रभु के कार्य में निर्जीव से लेकर जलचर तक—सभी सहयोगी बन जाते हैं और उनका मार्ग सुगम हो जाता है।


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