लंका काण्ड चौपाई (56-63)
लंका काण्ड चौपाई 56-63 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
नाथ दीनदयाल रघुराई। बाघउ सनमुख गएँ न खाई।।
चाहिअ करन सो सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते।।
संत कहहिं असि नीति दसानन। चौथेंपन जाइहि नृप कानन।।
तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता। जो कर्ता पालक संहर्ता।।
सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी। भजहु नाथ ममता सब त्यागी।।
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी। भूप राजु तजि होहिं बिरागी।।
सोइ कोसलधीस रघुराया। आयउ करन तोहि पर दाया।।
जौं पिय मानहु मोर सिखावन। सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन।।
भावार्थ :
मंदोदरी रावण को समझाते हुए कहती हैं—
हे प्रभु! श्रीराम दीनों पर दया करने वाले हैं। सिंह तो सामने आए बाघ को भी नहीं खाता—इसी प्रकार श्रीराम किसी भी शरणागत को कभी नहीं त्यागते। तुम जो करना चाहते हो, सब कर चुके, अब कोई उपाय शेष नहीं। देव, दानव, मनुष्य—सब पर श्रीराम की विजय है।
संतों की नीति है कि जो व्यक्ति दुष्टता न छोड़े, उसका चौथा पन (अधम अवस्था) जंगल में समाप्त होता है अर्थात नाश हो जाता है। इसलिए आप उस प्रभु का भजन करें, जो जगत का रचयिता, पालक और संहारकर्ता है (ब्रह्म, विष्णु, महेश रूप)। वही रघुवीर भक्तों पर कृपा करने वाले हैं।
मुनि (संत) जिस प्रभु को पाने के लिए राजपाट छोड़ देते हैं, वही भगवान श्रीराम दया करने के लिए स्वयं आपके पास आए हैं। यदि आप मेरी सीख मानें तो तीनों लोकों में आपका यश फैल जाएगा।
विस्तृत विवेचन:
1️⃣ “नाथ दीनदयाल रघुराई, बाघउ सनमुख गएँ न खाई”
मंदोदरी रावण को नीति समझाती है—
श्रीराम तो दीनों के दयालु हैं।
जैसे सिंह सामने आए बाघ को नहीं मारता, वैसे ही श्रीराम किसी भी शत्रु को, यदि वह शरण में आए, कभी नहीं मारते।
👉 यह शरणागत-वत्सलता का दिव्य गुण है।
2️⃣ “चाहिअ करन सो सब करि बीते, तुम्ह सुर असुर चराचर जीते”
रावण आपको जुबानी बहादुरी नहीं दिखानी चाहिए—
आप जितना करना चाहते थे सब कर लिया।
देव, दानव, सभी पर विजय पा चुके, अब और क्या करना है?
👉 अब श्रीराम से युद्ध व्यर्थ है।
3️⃣ “संत कहहिं असि नीति दसानन, चौथेंपन जाइहि नृप कानन”
यह लोकनीति की बात है—
जो व्यक्ति अन्याय छोड़कर मार्ग पर नहीं लौटता, उसका अंत जंगल में होता है।
👉 रावण को संकेत: अहंकार का अंत निश्चित है।
4️⃣ “तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता, जो कर्ता पालक संहर्ता
मंदोदरी अत्यंत विनम्र होकर सलाह देती है—
उस प्रभु का भजन करें जो त्रिगुणमय जगत का रचयिता, पालक और संहारक है।
👉 श्रीराम उसी पूर्ण ब्रह्म के अवतार हैं।
5️⃣ “सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी, भजहु नाथ ममता सब त्यागी”
श्रीराम भक्तों पर प्रेम वर्षा करने वाले हैं।
यदि आप सब मोह-ममता छोड़कर उनकी शरण स्वीकार कर लें, तो आपको कोई हानि नहीं हो सकती।
6️⃣ “मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी, भूप राजु तजि होहिं बिरागी”
साधु-संत जिस परम लक्ष्य के लिए राजपाट छोड़ देते हैं,
👉 वही श्रीराम स्वयम् दया करने के लिए आपके पास आए हैं।
ऐसी भीषण कृपा का अवसर बहुत दुर्लभ है।
7️⃣ “सोइ कोसलधीस रघुराया, आयउ करन तोहि पर दाया”
कोसलपति श्रीराम स्वयम् कृपा करने हेतु यहाँ आए हैं—
क्या इससे बड़ा सौभाग्य कोई हो सकता है?
8️⃣ “जौं पिय मानहु मोर सिखावन, सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन”
मंदोदरी अंतिम आग्रह करती है—
यदि आप मेरी बात मान लें,
तो तीनों लोकों में आपका फैल जाएगा।
👉 राम के पक्ष में खड़ा होना ही अमर यश का मार्ग है।
🌟 निष्कर्ष (सार)
यह पूरा प्रसंग मंदोदरी की नीति, भक्ति, विनम्रता और राम पर विश्वास का दिव्य उदाहरण है।
यह हमें सिखाता है—
✔ मोह छोड़ो
✔ ईश्वर का आश्रय लो
✔ अहंकार का अंत निश्चित है
✔ प्रभु के शरणागत की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं
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