लंका काण्ड दोहा (6)

 लंका काण्ड दोहा 6 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।

सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।।5।।

रावण आश्चर्य में पड़ कर समुद्र के दस नाम बननिधि,नीरनिधि,जलधि, सिंधु,बारीस,तोयनिधि,कंपति,उदधि, पयोधि और नदीस का अपने अलग-अलग मुखों से उच्चारण किया।

भावार्थ (सरल भाषा में):

भगवान राम के आदेश से समुद्र पर बाँध बना दिया गया। यह देखकर सत्य रूप से समुद्र (जल के स्वामी) काँप उठा, क्योंकि उसकी अपार लहरों पर अब वनराशि (वानर सेना) ने विजय पा ली थी। समुद्र स्वयं को असहाय और लज्जित अनुभव कर रहा था।

विस्तृत विवेचन:

1. “बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस।”

यहाँ ‘बननिधि’ = वननिधि, ‘नीरनिधि/जलधि/सिंधु’ = समुद्र

नल-नील की अगुवाई में वानर सेना ने विशाल समुद्र पर पत्थरों, पर्वतों, वृक्षों को डालकर सेतु बाँध दिया।

जिस समुद्र को पार करना असंभव माना जाता था, जिसे देव-दानव भी चुनौती न दे पाए—उसके ऊपर अब साधारण वानरों ने रास्ता बना दिया।

यह भगवान राम की शक्ति, प्रेरणा और संकल्प का चमत्कार है।

2. “सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।”

समुद्र को अनेक नामों से पुकारकर तुलसीदास जी यह बताना चाहते हैं कि पूरा समुद्र भय से काँपने लगा।

समुद्र सोच रहा है—जिस प्रभु के सामने मैं प्राकृतिक महाबाधा बनकर खड़ा था, उन्हीं के सेवक वानरों ने मुझे बाँध दिया!

यह राम की महाशक्ति और धर्म की विजय का प्रमाण है।

समुद्र की कंपन यह दर्शाती है कि प्रकृति भी राम के प्रताप से प्रभावित और विनीत हो गई।

मुख्य सीख:

भगवान के संकल्प के आगे प्रकृति और बाधाएँ भी झुक जाती हैं।

जब दैवी शक्ति साथ हो, तो असंभव भी संभव बन जाता है।

यह दोहा राम-सेतु निर्माण की महिमा और 

राम की दैवी शक्ति का अत्यंत सुंदर वर्णन है।


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