लंका काण्ड दोहा (7)
लंका काण्ड दोहा 7 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ।।6।।
भावार्थ
राम के चरणकमलों में सिर झुकाकर जानकी (सीता) को समर्पित कर दो; और अपना पुत्र को राज्य समर्पित कर स्वयं वन/बिरह में चले जाओ और रघुनाथ (राम) का भजन करो।
विस्तृत विवेचन
1. प्रसंग — यह दोह लंका काण्ड का है जहां मंदोदरी रावण को समझाने का प्रयास करती है।
2. अर्थ-निर्देश (हर शब्द का भाव)
रामहि सौपि जानकी — जानकी (सीता) को राम के पास सौंप देना (अर्थात् जिन संबंधों/वस्तुओं का समर्पण ईश्वर को करना चाहिए, उन्हें कर देना)।
नाइ कमल पद माथ — चरणकमलों में सिर नमन कर (आस्था और समर्पण का पूर्ण चिह्न)। यहाँ “कमल पद” ईश के पवित्र चरणों का रूपक है।
सुत कहुँ राज समर्पि — पुत्र को (या परिजन/उत्तराधिकारी को) राज्य सौंप देना; यानी सांसारिक उत्तरदायित्व अवतरित कर देना।
बन जाइ भजिअ रघुनाथ — स्वयं वनवासी बनकर (संन्यासी/विरागी होकर) रघुनाथ का भजन- ध्यान करना — पूर्ण निष्ठा से ईश्वर-भक्ति में मग्न होना।
3. सांस्कृतिक/नैतिक संदेश
यह दोहा वैराग्य व समर्पण का उपदेश देता है: जीवन में जब परम धर्म/ईश्वर-कारण कुछ मांगता है तो निजी लगाव और सांसारिक इच्छाएँ त्याग कर ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाओ।
यहाँ “सीता” और “पुत्र/राज्य” केवल व्यक्ति-विशेष नहीं, बल्कि प्रेम, परिवार, पद-प्रतिष्ठा, जिम्मेदारियाँ — सब लगाव के प्रतीक हैं। मंदोदरी रावण को समझाने का प्रयास करती है कि सीता को राम को लौटा कर अपना सिर भगवान राम के चरणों में झुका कर देना चाहिए और अपना राज्य अपने पुत्र को लेकर वन चले जाना चाहिए और राम जी की भक्ति में लग जाना चाहिए।
4. शैलीगत बात
सरल, सघन और आज्ञात्मक भाषा (दोहा)। “कमल पद” जैसा अलंकारिक शब्द और “सौपि… समर्पि” जैसे क्रिया-रूप दोहे को भावात्मक बनाते हैं।
2 मुख्य शिक्षा (आपकी प्रेफरेंस के अनुसार)
1. समर्पण — परमात्मा के समक्ष अपने अहंकार, सम्बन्ध और सत्ता समर्पित कर देना परम मोक्ष/भक्ति का रस्ता है।
2. वैराग्य — सांसारिक सत्ता/संबंधों का त्याग कर
के ईश्वर-भक्ति ही वास्तविक शांति देता है।
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