लंका काण्ड चौपाई (73-82)
लंका काण्ड चौपाई 73-82 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती। नाथ न पूर आव एहि भाँती।।
बारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महुँ सबु गावा।।
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू। जारत नगरु कस न धरि खाहू।।
सुनत नीक आगें दुख पावा। सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा।।
जेहिं बारीस बँधायउ हेला। उतरेउ सेन समेत सुबेला।।
सो भनु मनुज खाब हम भाई। बचन कहहिं सब गाल फुलाई।।
तात बचन मम सुनु अति आदर। जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।।
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं।।
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती। सीता देइ करहु पुनि प्रीती।।
भावार्थ :
इस चौपाई में प्रहस्त रावण को समझाने की कोशिश कर रहा है। श्रीराम के बारे में अपने मंत्रियों से चर्चा कर रहा है। कुछ मूर्ख मंत्री रावण की झूठी प्रशंसा करते हैं और राम को हल्का दिखाने की कोशिश करते हैं। प्रहस्त कहते हैं—यदि एक वानर समुद्र पार करके आ सकता है और लंका को जला सकता है, तो उसे पहले ही पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? ऐसा कहकर वे राम की महिमा को बताते हैं।
प्रहस्वत रावण को समझाता है कि ये मंत्रियों की गलत वाणी उसे भटका रही है। वह कहता है—
मीठी वाणी बोलने और सुनने वाले ही संसार में श्रेष्ठ होते हैं
जो कड़वी लेकिन हितकारी बात सुनते और कहते हैं, वे बड़े दुर्लभ होते हैं।
फिर वह नीति बताता है कि सबसे पहले वैदेही (सीता) को सम्मान से लौटा दो, यही सर्वोत्तम नीति है।
🌻 विस्तृत विवेचन
1️⃣ मूर्ख मंत्रियों की चापलूसी
पहली पंक्तियों में तुलसीदास जी बताते हैं कि रावण के सचिव (मंत्री) मूर्ख और चापलूस थे।
वे राम की बड़ाई करते हुए रावण को समझाता है:-
वे कहते हैं कि "यदि वानर समुद्र पार करके लंका आया तो तुमने उसे भूखे रहते क्यों नहीं खा लिया?"
इसका मतलब वे राम की शक्ति को स्वीकार ही नहीं करते।
👉 यही “दुराचारी राजा + मूर्ख मंत्रियों” का बड़ा संकेत है।
2️⃣ रावण को कटु सत्य सुनकर पीड़ा होती है
प्रहस्त रावण को समझाता है कि वानरों की सेना समुद्र बाँधकर पहुँच गई है, तो वह समझ जाता है कि वास्तविकता छिपाई जा रही है।
उसे दुख होता है कि मंत्री झूठ बोलकर उसके अहंकार को बढ़ा रहे हैं।
3️⃣ मीठी और हितकारी वाणी का अंतर
रावण को समझाता है कि
मीठी बात सुनने और बोलने वाले बहुत होते हैं,
लेकिन कटु पर हितकारी सत्य कहने वाले लोग अत्यंत दुर्लभ होते हैं।
यह नीति का सुंदर संदेश है —
चापलूसी सत्य नहीं होती।
हितकारी आलोचना ही किसी के लिए उपयोगी होती है।
4️⃣ रावण की अंतिम सलाह: सीता को लौटा दो
प्रहस्त कहता है—
“सबसे पहले अपने महामंत्री भेजकर कहो कि सीता को लौटा देना ही सर्वोत्तम नीति है।”
यह रावण को समझाने का अंतिम प्रयास है
परंतु उसका अहंकार उसे सत्य स्वीकार नहीं करने देता।
🌺 निष्कर्ष
इस चौपाई में बताया गया है कि
मूर्ख सलाहकार हमेशा विनाश का कारण बनते हैं,
सत्य सुनकर दुख होता है, पर वही हितकारी होता है,
और रावण भी भीतर से जानता
था कि सीता को लौटाना ही सही नीति है,
परंतु अहंकार ने उसे पतन की ओर धकेल दिया।
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