लंका काण्ड दोहा (8)

 लंका काण्ड दोहा 8 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दोहा –

दो० – अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात।

नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात।। 7 ।।

भावार्थ :

मंदोदरी विनीत भाव से रावण को समझाती है कि “हे नाथ! श्रीराम का भजन करिए, वही सबका कल्याण करने वाले हैं।”

यह कहकर उनके नेत्रों में आँसू भर आते हैं, शरीर काँपने लगता है और वे रावण के चरण पकड़कर विनती करती है कि “हे स्वामी! प्रभु राम का भजन करें, यही आपका स्थिर और शुभ कल्याणकारी आशीर्वाद होगा।

विस्तृत विवेचन :

इस प्रसंग में मंदोदरी अपने पति रावण को अंतिम बार धर्म और सत्य का मार्ग अपनाने की सलाह देती है।

वह जानते हैं कि रावण अत्यंत अहंकारी है, परंतु फिर भी पत्नी धर्म निभाते हुए उसे सत्य मार्ग पर लाना चाहती है।

1. "अस कहि नयन नीर भरि"

मंदोदरी की आँखें भर आती हैं।

क्योंकि -

वे रावण के पतन को सामने देख रही है।

उन्हें पता है कि अहंकार का परिणाम विनाश ही होता है।

फिर भी पत्नी होने के नाते उसके मन में करूणा है।

उनकी आँसू बताती हैं कि सच्चा शुभचिंतक वही है, जो कठोर समय में भी सही सलाह देता है।

2. "गहि पद कंपित गात"

मंदोदरी रावण के चरण पकड़ लेती है।

उनका शरीर कांप रहा है —

भय से नहीं,

बल्कि दुःख और चिंता से कि रावण न सुनने पर युद्ध और विनाश तय है।

यह विनम्रता का सर्वोच्च रूप है

मंदोदरी जानती है कि सत्य कहना कठिन है, पर वे सत्य कहने से पीछे नहीं हटती 

3. "नाथ भजहु रघुनाथहि"

वे स्पष्ट रूप से कहती है—

हे नाथ! आप श्रीराम का भजन कीजिए।

यानी —

अहंकार छोड़िए

धर्म का साथ दीजिए

श्रीराम की शरण में जाइए

मंदोदरी यहां भक्ति का सार बताते हैं — प्रभु राम का भजन ही जीवन का कल्याण है।

4. "अचल होइ अहिवात"

मंदोदरी कहती है—

यदि आप राम का भजन करेंगे तो मेरा सुहाग सुरक्षित रहेगा।

यहाँ एक गहरी बात है —

सच्चे आशीर्वाद का आधार धर्म और भक्ति होता है, न कि किसी का पक्षपात।

सारांश :

 मंदोदरी आँसू भरी आँखों से रावण को समझाती है कि अहंकार छोड़कर श्रीराम की शरण लीजिये —यही स्थायी समाधान  है।



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