लंका काण्ड चौपाई (83-91)

 लंका काण्ड चौपाई 83-91 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।

सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।।

अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।।

सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।।

हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।।

संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।।

लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।।

बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।।

बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।

विस्तृत विवेचन – लंका काण्ड (अध्याय: प्रहस्त और रावण के पुत्र द्वारा रावण को समझाने की कोशिश)

दिए गए चौपाई-श्लोक उस प्रसंग के है जब प्रहस्त और रावण के पुत्र ने रावण को समझाया कि श्रीराम से बैर छोड़कर माता सीता को लौटा दें, पर रावण अहंकार में भरकर उसका का अपमान करता है।

मूलपाठ एवं भावार्थ

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।।

अर्थ: यदि तुम मेरी बात नहीं मानते, तो भी तुम्हारे शौर्य और कीर्ति की प्रशंसा जगत में होती है—दोनों प्रकार से तुम्हारी शोभा ही होगी।

(वह विनम्रता से कहता है—आप मेरी बात मानें या न मानें, आपकी महानता झूठी नहीं होगी।)

सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।।

रावण क्रोध में पुत्र से कहता है—हे मूर्ख! तुझे ऐसी नीच बुद्धि किसने सिखाई?

अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।।

रावण धमकाते हुए कहता है—यदि तुरंत मेरे मन का संशय दूर न हुआ, तो मैं तुझे बेनु (बेंत) से पीटकर दंड दूँगा।

सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।।

पुत्र कहता है—ऐसे कठोर एवं भयावह वचन सुनकर मैं आपकी सभा छोड़कर जा रहा हूँ।

हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।।

पुत्र कहता है—आपको शुभ सलाह क्यों नहीं सुहाती? जैसे मृत्यु-शैया पर पड़े रोगी को औषध बेकार लगती है।

संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।।

संध्या समय समझकर रावण बीस भुजाओं वाला अपने भवन की ओर चला।

लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।।

लंका के उच्च शिखर पर उसका महल था, जो अति विचित्र और भव्य था।

बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।।

रावण मंदिर में बैठ गया, और किंनर उसके गुणों के गीत गाने लगे।

बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।

ताल, पखावज, वीणा जैसे वाद्य बजने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं।

विस्तृत विवेचन

इस प्रसंग में:

प्रहस्त और रावण का पुत्र नीति, भक्ति और सद्बुद्धि का प्रतीक है। वह रावण को समझाता है कि श्रीराम से विरोध विनाश का कारण बनेगा।

रावण अहंकार, मद और अविवेक का प्रतीक है। इसलिए वह उनकी की हित–बात को अपमान मानकर क्रोधित हो उठता है।

पुत्र का कहना—“मृत्यु निकट हो तो औषध व्यर्थ लगती है” —रावण के विनाश का संकेत है।

रावण की सभा में संगीत, नृत्य और विलास का वर्णन दिखाता है कि आसन्न मृत्यु के समय भी दुष्ट व्यक्ति अहंकार और विलास में डूबा रहता है।

यह प्रसंग सिखाता है:

दो मुख्य सीख (संक्षेप में)

1. अहंकार बुद्धि नष्ट कर देता है; हित की बात सुनाई नहीं 

देती।

2. सत्संग और सदुपदेश छोड़ने से विनाश निश्चित है।



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