लंका काण्ड दोहा (9)
लंका काण्ड दोहा 9 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।
निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि।।8।।
भावार्थ (सरल भाषा में)
प्रहस्त (रावण का प्रमुख मंत्री और सेनापति) हाथ जोड़कर कहता है—
“हे प्रभु! आपने सबकी बात सुन ली। लेकिन इन मंत्रियों की बुद्धि बहुत छोटी है। इनकी बात मानकर नीति–विरोध का कार्य मत कीजिए।”
अर्थात प्रहस्त रावण को समझाता है कि बाकी मंत्री डरकर या मूर्खतावश गलत सलाह दे रहे हैं। नीति-संगत और दूरदर्शी निर्णय लेना ही उचित है।
विस्तृत विवेचन
1. प्रसंग
यह प्रसंग लंका काण्ड का है। मंदोदरी के समझाने के बाद रावण राक्षस मंत्रियों की सभा बुलाते हैं। सभी मंत्री अपनी–अपनी सलाह देते हैं। अधिकांश मंत्री घबराकर युद्ध से बचने या गलत राय देने लगते हैं। तब प्रहस्त समझदारी की सलाह देता है।
2. “सब के बचन श्रवन सुनि” – सभी की राय सुनने के बाद
रावण ने सभी मंत्रियों की बात ध्यान से सुनी। तुलसीदास जी यह दिखाते हैं कि सुनना राजा का कर्तव्य है, परंतु सही निर्णय समझदारी से ही लिया जाता है। सुनना और मान लेना दोनों अलग बातें हैं।
3. “कह प्रहस्त कर जोरि” – विनम्रता से सलाह
प्रहस्त बहुत प्रिय और महत्वपूर्ण मंत्री है। वह हाथ जोड़कर विनम्रता से कहता है—
राजा को सत्य बात सम्मानपूर्वक कहनी चाहिए, चाहे वह कठोर ही क्यों न हो।
4. “निति बिरोध न करिअ प्रभु” – नीति-विरोध मत करें
प्रहस्त रावण से कहता है कि—
जो काम धर्म, नीति और विवेक के विरोध में हो, वह राजधर्म नहीं है।
सीता–हरण पहले ही नीति-विरुद्ध था, अब युद्ध करके और विनाश मोल लेना बिल्कुल अनुचित है।
5. “मत्रिंन्ह मति अति थोरि” – मंत्रियों की समझ छोटी है
प्रहस्त स्पष्ट रूप से कहता है कि—
ये सलाह देने वाले मंत्री डरपोक, अल्प-बुद्धि और दूरदर्शिता रहित हैं।
किसी निर्णय के लिए केवल भय या आवेश से दी गई सलाह उचित नहीं होती।
6. सीख (उपदेश)
यह दोहा हमें समझाता है—
1. राजा को सभी की सुननी चाहिए, पर अंतिम निर्णय बुद्धि, नीति और सत्य पर आधारित होना चाहिए।
2. डर, लालच या मूर्खता से दी गई सलाह का अनुसरण करना विनाश का कारण बनता है।
3. सच्चा मंत्री वही
है जो राजा को सही रास्ता दिखाए, भले वह बात कठोर क्यों न लगे।
Comments
Post a Comment