लंका काण्ड चौपाई (92-99)

 लंका काण्ड चौपाई 92-99 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।

सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी।।

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।।

ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला।।

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।।

दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।।

बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।।

प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।।

भावार्थ

जब भगवान श्रीराम लंका पर आक्रमण हेतु सेना सहित आगे बढ़ते हैं, तब वे सुबेल पर्वत पर डेरा डालते हैं। सेना अत्यन्त वीर और उत्साहित थी। पर्वत पर एक अत्यन्त सुंदर, ऊँचा और रमणीय शिखर था—सफेद, उज्ज्वल और मनोहारी। उसी स्थान पर लक्ष्मणजी ने अपने हाथों से पत्तों और फूलों द्वारा एक आसन (डसौना) तैयार किया, उस पर मुलायम मृगछाला बिछाई गई। उस पर भगवान राम कृपा करके विराजमान हुए।

प्रभु के पास कपीश सुग्रीव सिर झुकाकर खड़े हुए थे। रामजी के दोनों ओर धनुष और तरकश रखे थे। भगवान दोनों हाथों से बाणों को सँवार रहे थे और लंकेश रावण की मंत्रणा सुन रहे थे—अर्थात युद्ध नीति पर विचार करते हुए युद्ध के लिए मानसिक रूप से तैयार थे।

अत्यन्त भाग्यशाली अंगद एवं हनुमान प्रभु के चरण कमलों को दबा रहे थे (सेवा कर रहे थे)। प्रभु के पीछे लक्ष्मण वीरासन में बैठे थे, कटि पर तरकश और हाथ में धनुष लिए।

विस्तृत विवेचन

यह दृश्य भगवान राम की वीरता, सौम्यता, और दिव्य शासन शैली को प्रदर्शित करता है—

1. युद्धपूर्व गंभीरता और नीति

राम युद्ध को केवल शक्ति से नहीं, नीति, संयम और न्याय के साथ करते हैं। पर्वत पर बैठना नेतृत्व की ऊँचाई का प्रतीक है—ऊपर से पूरी स्थिति का अवलोकन।

2. भक्त-सेवा और प्रभु-प्रेम

हनुमान, अंगद, और सुग्रीव का प्रभु के पास सेवा में खड़ा रहना दिखाता है कि भक्ति में अधिकार नहीं, विनम्रता और समर्पण होता है।

3. सभी पात्रों का प्रतिनिधित्व

राम – धर्म और नेतृत्व

लक्ष्मण – सेवा, त्याग और अनुशासन

हनुमान व अंगद – पराक्रम और समर्पण

सुग्रीव – नीति और कूटनीति

4. युद्ध का मनोवैज्ञानिक संकेत

राम का बाण सँवारना और नीति सुनना युद्ध का संकेत है, जो बताता है कि वह युद्ध को विनाश नहीं बल्कि अधर्म के नाश के लिए करते हैं।

उपसंहार

यह चौपाई भक्ति, नीति, वीरता और नेतृत्व का उत्कृष्ट चित्रण है। भगवान राम लंका युद्ध के पहले — शांति, संयम और तैयारी का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह शिक्षा देती है कि धर्म का संघर्ष बुद्धि और विनम्रता से जीता जाता है।



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