लंका काण्ड श्लोक (1-3)
लंका काण्ड श्लोक 1-3 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।1।।
शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्।।2।।
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे।।3।।
यह श्लोक लंका काण्ड में भगवान शिव की स्तुति के रूप में आता है, जहाँ तुलसीदासजी भगवान राम के लिए शिव की अनन्य भक्ति और उनके स्वरूप का वर्णन करते हैं।
अब प्रत्येक श्लोक का भावार्थ व विवेचन—
श्लोक 1
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्।।
भावार्थ:
मैं उस श्रीराम को नमस्कार करता हूँ — जिन्हें स्वयं कामदेव के शत्रु (शिवजी) भी पूजते हैं, जो संसार रूपी भय का नाश करते हैं, जो काल रूपी मदमत्त हाथी के लिए सिंह हैं। वे योगियों द्वारा ध्यान में प्राप्त होते हैं, गुणों के भंडार, अजित (अविजित), निर्गुण और निर्विकार हैं। वे माया से परे, देवताओं के अधिपति, दुष्टों के विनाश में तत्पर, ब्रह्मादि ऋषियों द्वारा पूजित, कंद के समान गौर वर्ण वाले, कमलनयन और पृथ्वी के ईश्वर रूप हैं।
विवेचन:
यहाँ तुलसीदासजी ने भगवान राम के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया है। राम शिव के भी आराध्य हैं — इसका अर्थ है कि भगवान शिव स्वयं भी रामभक्ति में लीन हैं। “कालमत्तेभसिंहं” से उनके भयविनाशक और अजेय रूप का बोध होता है। यह श्लोक भगवान राम के परम ब्रह्म स्वरूप को प्रकट करता है।
श्लोक 2
शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्।।
भावार्थ:
मैं भगवान शंकर को प्रणाम करता हूँ — जिनका शरीर चाँद और शंख के समान अत्यंत सुंदर है, जो बाघचर्म धारण करते हैं, जिनके आभूषण भयंकर सर्प हैं, जिन्हें गंगा और चंद्रमा प्रिय हैं। जो काशी के स्वामी हैं, कलियुग के पापों को नष्ट करने वाले हैं, कल्याण के कल्पवृक्ष हैं, पार्वतीपति, गुणों के भंडार और कामदेव को भस्म करने वाले हैं।
विवेचन:
यह श्लोक भगवान शिव के स्वरूप और गुणों का स्तवन है। तुलसीदासजी ने शिव की करुणामयी, भूतभावन और जगत-कल्याणकारी छवि प्रस्तुत की है। वे पापों का नाश करते हैं और भक्तों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
श्लोक 3
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे।।
भावार्थ:
जो भगवान शंकर सज्जनों को वह दुर्लभ कैवल्य-मोक्ष भी देते हैं और दुष्टों को दण्ड देने वाले हैं — वे शंकर मेरे लिए कल्याण (शं) प्रदान करें।
विवेचन:
यहाँ तुलसीदासजी शिव के न्यायप्रिय स्वभाव की स्तुति करते हैं। वे भक्तों को मोक्ष देने वाले और अधमों को सुधारने वाले हैं। तुलसीदासजी शिव से अपने लिए “शं” अर्थात् मंगल की कामना करते हैं।
सारांश:
इन श्लोकों में तुलसीदासजी ने भगवान राम और भगवान शंकर — दोनों की महिमा का गान किया है। एक ओर राम परब्रह्म हैं, तो दूसरी ओर शिव उनके अनन्य भक्त। दोनों का पारस्परिक प्रेम और भक्तों के प्रति कृपा का भाव इस स्तुति में झलकता है।
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