लंका काण्ड चौपाई (19-27)
लंका काण्ड चौपाई 19-27 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई —
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं।।
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि।।
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए।।
गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती।।
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।।
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।।
महिमा यह न जलधि कइ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी।।
भावार्थ (सारांश):
भगवान श्रीराम कहते हैं कि —
जो कोई भी रामेश्वरम का दर्शन करेगा, वह शरीर त्याग के बाद मेरे लोक को प्राप्त होगा।
जो व्यक्ति वहाँ गंगाजल लाकर चढ़ाएगा, उसे सायुज्य मुक्ति (भगवान से एकत्व) की प्राप्ति होगी।
जो कोई बिना छल-कपट के भगवान शिव की सेवा करेगा, उसे शिवजी भक्ति का वरदान देंगे।
और जो मेरे द्वारा निर्मित इस सेतु (रामसेतु) का दर्शन करेगा, वह बिना किसी कठिनाई के संसार-सागर से पार हो जाएगा।
इन वचनों से सब मुनि प्रसन्न होकर अपने-अपने आश्रम को लौट गए।
पार्वती जी! यही रघुनाथजी की नीति है कि वे सदा प्रणतों (भक्तों) पर प्रेम करते हैं।
नील और नल के द्वारा जब राम सेतु बन गया, तब रामकृपा का यश सब ओर फैल गया।
जैसे कोई पत्थर पानी में डूबता है और कोई तैरता है, उसी प्रकार राम की कृपा से असंभव कार्य संभव हुआ।
यह न तो समुद्र की महिमा है, न पत्थरों का गुण, न ही वानरों की शक्ति, बल्कि यह सब राम की कृपा का प्रभाव है।
विस्तृत विवेचन:
लंका काण्ड की यह चौपाई रामेश्वरम तीर्थ की महिमा और रामकृपा की अद्भुत शक्ति को प्रकट करती है।
श्रीराम स्वयं इस तीर्थ को पवित्र बताते हैं और कहते हैं कि जो भी इस स्थान का दर्शन या पूजन करेगा, वह मोक्ष का भागी होगा।
यहां श्रीराम ने भक्ति, श्रद्धा और शिवभक्ति तीनों को सर्वोच्च बताया है।
रामेश्वर तीर्थ का अर्थ है – जहाँ राम ने शिव की स्थापना की थी।
यह स्थान शिव-राम एकत्व का प्रतीक है।
अंतिम चौपाइयों में तुलसीदासजी बताते हैं कि रामसेतु का निर्माण केवल राम की कृपा का परिणाम था।
वानर तो माध्यम थे, लेकिन चमत्कार राम की शक्ति का था — जिसने पत्थरों को भी तैरने योग्य बना दिया।
संदेश:
यह चौपाई हमें सिखाती है कि
👉 सच्ची भक्ति, श्रद्धा और बिना छल के सेवा करने से भगवान की कृपा अवश्य मिलती है।
👉 जहाँ भगवान और भक्त दोनों का मिलन होता है, वहाँ असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
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