लंका काण्ड चौपाई (47-55)
लंका काण्ड चौपाई 47-55 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई:
निजबिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।।
कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।।
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।।
नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।।
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।।
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।।
जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।।
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।।
भावार्थ (सरल भाषा में)
इस चौपाई में मंदोदरी, जो अत्यंत बुद्धिमती और धर्मशील रानी है, रावण को समझाती है कि वह अपने अभिमान, क्रोध और जिद को छोड़ दे।
वह कहती है—
राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वह सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु के अवतार हैं। जिन महाबलियों को दैत्य भी नहीं जीत पाए, उन्हें राम ने खेल-खेल में मार दिया। इसलिए उनसे बैर करना काल को निमंत्रण देने जैसा है।
मंदोदरी रावण से निवेदन करती है कि वह अपनी भूल स्वीकार करे, माता सीता को लौटा दे, और राम से विरोध छोड़ दे, क्योंकि उनका विरोध करना सूर्य से जुगनू लड़ाने जैसा है।
भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन
❖ “निज बिकलता बिचारि बहोरी। बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी।।’’
भावार्थ:
अपनी व्याकुलता को सोचकर रावण अपने महल (गृह) की ओर चला गया। वह बाहर से हँस रहा था, पर भीतर से भय और चिन्ता से भरा हुआ था।
विवेचन:
रावण बाहर दिखावा करता है कि उसे कोई डर नहीं, पर भीतर से उसका अंतःकरण Rama-शक्ति को समझ चुका है। यह अभिमान और वास्तविक भय के संघर्ष को दर्शाता है।
❖ “मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो। कौतुकहीं पाथोधि बँधायो।।’’
भावार्थ:
मंदोदरी ने सुना कि श्रीराम समुद्र पर सेतु बनाकर यहाँ आ रहे हैं।
विवेचन:
मंदोदरी समझ जाती है कि जो पुरुष खारे समुद्र पर पत्थरों का पुल बना सकता है, वह कोई साधारण मानव नहीं हो सकता। यह राम की दिव्य सामर्थ्य का स्पष्ट संकेत है।
❖ “कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बोली परम मनोहर बानी।।’’
भावार्थ:
मंदोदरी रावण का हाथ पकड़कर उसे भीतर ले गई और अत्यंत मधुर और विनयी वाणी में समझाने लगी।
विवेचन:
वह कठोर नहीं बोलती—क्योंकि बुद्धिमान स्त्री हमेशा कोमल वचनों से बड़े से बड़ा संकट दूर कर सकती है।
❖ “चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा। सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा।।’’
भावार्थ:
मंदोदरी ने रावण के चरण स्पर्श कर विनती की—हे प्रिय! क्रोध छोड़कर मेरी बात सुनिए।
विवेचन:
यह मंदोदरी का धर्म, विनय और गृहस्थी का आदर्श रूप दर्शाता है। वह जानती है कि रावण का क्रोध ही उसके विनाश का कारण है।
❖ “नाथ बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिअ जीति जाही सों।।’’
भावार्थ:
स्वामी! वैर तो उसी से करना चाहिए, जिसे बुद्धि से, बल से या किसी उपाय से जीता जा सके।
विवेचन:
मंदोदरी नीति का सार बताती है—
दुश्मन वही बनाओ जो जीता जा सके। अजेय से युद्ध मूर्खता है।
❖ “तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा। खलु खद्योत दिनकरहि जैसा।।’’
भावार्थ:
हे नाथ! आपकी और श्रीराम की तुलना ही कैसी? जैसे जुगनू की सूर्य से तुलना नहीं हो सकती।
विवेचन:
ये पंक्ति राम-रावण शक्ति-भेद को स्पष्ट रूप से बताती है—
रावण शक्तिशाली है, पर राम सूर्य के समान—
दिव्य, तेजस्वी, असीम, अपराजेय।
❖ “अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे। महाबीर दितिसुत संघारे।।’’
भावार्थ:
राम ने मधु-कैटभ जैसे बलवान दैत्यों को भी मारा है। अनेक महाबली दैत्यों को भी वे पहले ही परास्त कर चुके हैं।
विवेचन:
यह राम के पूर्व अवतारों में विष्णु की कीर्ति का स्मरण है—
मधु-कैटभ, धेनुकासुर, वृतासुर आदि सभी असुर भगवान द्वारा मारे गए।
❖ “जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा। सोइ अवतरेउ हरन महि भारा।।’’
भावार्थ:
जिन्होंने सहज रूप से बली को बाँधकर मार दिया, वही प्रभु इस धरा का भार उतारने के लिए अवतरित हुए हैं।
विवेचन:
राम का उद्देश्य अधर्म का विनाश है।
रावण अधर्म का मुख्य कारण है, इसलिए उसका विनाश निश्चित है।
❖ “तासु बिरोध न कीजिअ नाथा। काल करम जिव जाकें हाथा।।’’
भावार्थ:
नाथ! जिनके हाथ में सब जीवों की आयु और काल है, उनका विरोध मत कीजिए।
विवेचन:
मंदोदरी बताती है—
राम का विरोध करना काल से लड़ने जैसा है।
उनकी इच्छा के बिना कोई पत्ता तक नहीं हिलता।
✦ संक्षेप सार
मंदोदरी रावण को विनयपूर्वक समझाती है—
राम कोई मनुष्य नहीं, परमेश्वर के अवतार हैं।
उन्हीं से वैर कर रहे हो जो अजेय हैं।
यह मार्ग तुम्हें निश्चित विनाश की ओर ले जा रहा है।
सीता को लौटा दो और राम से विरोध मत करो।
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