लंका काण्ड चौपाई (64-72)
लंका काण्ड चौपाई 64-72 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
तब रावन मयसुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई।।
सुनु तै प्रिया बृथा भय माना। जग जोधा को मोहि समाना।।
बरुन कुबेर पवन जम काला। भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला।।
देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें।।
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई।।
मंदोदरीं हदयँ अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना।।
सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा। करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा।।
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा। बार बार प्रभु पूछहु काहा।।
कहहु कवन भय करिअ बिचारा। नर कपि भालु अहार हमारा।।
भावार्थ :
रावण माया की पुत्री (मयसुता) को उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है और घमंड से कहता है कि तुम व्यर्थ ही डर रही हो। संसार का कोई योद्धा मेरे समान नहीं है। मैंने अपने भुजबल से वरुण, कुबेर, पवन, यम और काल तक को जीत लिया है। देवता, दानव और मनुष्य — सब मेरे वश में हैं, फिर तुम किस कारण डर रही हो?
मंदोदरी समझ जाती है कि रावण का यह अभिमान काल-प्रेरित है। सभा में जाकर रावण मंत्रियों से पूछता है कि शत्रु राम से युद्ध किस प्रकार किया जाए। मंत्री बार-बार वही बात कहते हैं कि भय कैसा? नर, वानर और भालू तो हम अपना भोजन बनाते हैं।
विस्तृत विवेचन :
१. रावण का अहंकार और भ्रमित बुद्धि
रावण मयसुता (माया की पुत्री) को उठाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। इससे उसके मन में छिपा हुआ अहंकार प्रकट होता है।
वह कहता है—
मुझ जैसा वीर जग में कोई नहीं।
देवताओं से लेकर दिक्पालों तक को जीत चुका हूँ।
सब मेरे अधीन हैं।
यह रावण की वही अवस्था है जब अहंकार मनुष्य को वास्तविकता देखने नहीं देता। शत्रु की शक्ति को कम आँकना और अपनी शक्ति को असीम समझना— यही उसके विनाश का कारण बना।
२. मंदोदरी का विवेक
मंदोदरी अत्यंत बुद्धिमती थी।
उसे समझ में आता है कि—
“यह अभिमान रावण के भीतर इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि काल (मृत्यु) निकट है।”
जब विनाश निकट होता है, व्यक्ति सलाह नहीं सुनता, वास्तविकता नहीं समझता— यही रावण के साथ हो रहा था।
३. सभा में मंत्रणा
रावण सभा में आता है और मंत्रियों से पूछता है कि राम से युद्ध किस तरह किया जाए।
यहाँ रावण का मन डगमगा रहा है।
पर अहंकार उसे झुकने नहीं देता।
वह समाधान पूछता तो है, पर मन में राम को स्वीकार नहीं करता।
४. मूर्ख मंत्रियों की चापलूसी
मंत्री डर और चापलूसी में कह देते हैं—
“हे नाथ! आप बार-बार किस बात का भय पूछते हैं?”
“मनुष्य, वानर और भालू तो हमारे लिए भोजन समान हैं।”
मंत्रियों के इस व्यवहार से स्पष्ट होता है कि—
राजा यदि अहंकारी हो जाए तो मंत्री भी सत्य बोलने का साहस खो देते हैं।
चापलूसी शासन को विनाश की ओर ले जाती है।
यही रावण के राज्य के पतन की एक प्रमुख वजह थी।
५. इस प्रसंग का संदेश
अहंकार का अंत विनाश ही है।
बुद्धिमान की बात सुनने वाला ही बचता है।
चापलूस सलाहकार किसी भी शक्ति को निरर्थक कर देते हैं।
जब मृत्यु या संकट पास होता है, मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है।
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