लंका काण्ड चौपाई (1-10)
लंका काण्ड चौपाई 1-10 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।।
तब रिपु नारी रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।।
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी।।
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई।।
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।।
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।।
राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू।।
धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।
सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा।।
यह अंश रामचरितमानस के लंका काण्ड से लिया गया है — जहाँ समुद्र पर सेतु निर्माण का प्रसंग वर्णित है। नीचे भावार्थ और विस्तृत विवेचन दिया गया है👇
🌸 चौपाई:
यह लघु जलधि तरत कति बारा।
अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा।।
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी।
सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी।।
भावार्थ:
हनुमान जी ने कहा — "प्रभु! यह छोटा-सा समुद्र पार करने में क्या देर है! आपके प्रताप से तो मैं अग्नि समान तेज से इसे पहले ही सुखा सकता हूँ।"
विवेचन:
यहाँ हनुमान जी की राम के प्रति अटूट श्रद्धा और उत्साह दिखाया गया है। वे कहते हैं कि यह सागर उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यह पंक्ति वीरता और प्रभु के प्रति भक्ति दोनों का प्रतीक है।
🌸 अगली चौपाइयाँ:
तब रिपु नारी रुदन जल धारा।
भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा।।
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी।
हरषे कपि रघुपति तन हेरी।।
भावार्थ:
हनुमान जी कहते हैं कि पहले जब लंका जली थी, तब शत्रु की स्त्रियों के आँसुओं से यह समुद्र पुनः भर गया और खारा (नमकीन) बन गया।
राम जी हनुमान के वचन सुनकर प्रसन्न हुए और वानरों की ओर स्नेह से देखा।
विवेचन:
हनुमान जी का यह उत्तर हास्य और वीरता दोनों का संगम है। वे विनम्रता से अपनी शक्ति का उल्लेख करते हैं, पर रामजी के आदेश का पालन ही मुख्य रखते हैं।
🌸 आगे:
जामवंत बोले दोउ भाई।
नल नीलहि सब कथा सुनाई।।
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं।
करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं।।
भावार्थ:
जामवंत जी ने नल और नील दोनों भाइयों को बुलाकर कहा — “रामजी के प्रताप से सेतु बनाओ, इसमें कोई कठिनाई नहीं होगी।”
विवेचन:
जामवंत जी सलाह देते हैं कि सेतु-निर्माण का कार्य प्रभु के नाम और प्रताप से सहज हो जाएगा। यह कर्म और श्रद्धा का सुंदर संदेश है।
🌸 अंतिम भाग:
बोलि लिए कपि निकर बहोरी।
सकल सुनहु बिनती कछु मोरी।।
राम चरन पंकज उर धरहू।
कौतुक एक भालु कपि करहू।।
धावहु मर्कट बिकट बरूथा।
आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।
सुनि कपि भालु चले करि हूहा।
जय रघुबीर प्रताप समूहा।।
भावार्थ:
जामवंत जी ने सब वानरों और भालुओं को बुलाकर कहा — “सभी रामजी के चरणों को हृदय में धारण करो और अब एक अद्भुत कार्य करो — पहाड़ों और वृक्षों को लाकर सेतु बनाओ।”
वानर जयकार करते हुए चल पड़े — “जय श्री रघुबीर!”
विवेचन:
यहाँ उत्साह, एकता और प्रभु-भक्ति की शक्ति प्रकट होती है। वानर सेना सामूहिक रूप से दिव्य प्रेरणा से कार्य में जुट जाती है। यह प्रसंग सिखाता है कि जब संकल्प में भगवान का नाम और उद्देश्य जुड़ जाए, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।
🌺 सारांश:
इस पूरे प्रसंग में तुलसीदास जी दिखाते हैं कि —
हनुमान जी की वीरता और भक्ति,
जामवंत की बुद्धिमत्ता,
और वानर दल की एकता —
इन सबके मेल से रामसेतु निर्माण हुआ।
यह मनुष्य को प्रेरणा देता है कि श्रद्धा, परिश्रम और प्रभु-विश्वास से हर बाधा पार की जा सकती है।
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