लंका काण्ड चौपाई (11-18)
लंका काण्ड चौपाई 11-18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं।।
देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना।।
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी।।
करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना।।
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए।।
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
भावार्थ (सरल अर्थ):
वानरों ने विशाल पर्वत लाकर नल-नील को दिए, और वे उन पर्वतों को कंदुक (गेंद) की तरह लेकर सेतु बनाते गए। श्रीराम ने जब उस सुंदर और अद्भुत सेतु की रचना देखी, तो वे हँसकर बोले — यह भूमि अत्यंत रमणीय और पवित्र है, जिसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है।
श्रीराम बोले — “मैं यहाँ भगवान शंकर की स्थापना करूँगा, क्योंकि यह मेरे हृदय की परम अभिलाषा है।”
श्रीराम के आदेश से सुग्रीव ने बहुत-से दूत भेजकर सब मुनियों को बुलवाया। फिर श्रीराम ने वहाँ विधिपूर्वक शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की।
श्रीराम कहते हैं — “शिवजी के समान मुझे कोई और प्रिय नहीं है। जो शिवद्रोही है, वह मेरा भक्त नहीं हो सकता। ऐसा व्यक्ति स्वप्न में भी मुझे नहीं पा सकता। जो शिव से विमुख होकर मेरी भक्ति करना चाहता है, वह मूर्ख और नरकगामी है।”
विस्तृत विवेचन:
यह प्रसंग सेतु-निर्माण के बाद का है।
नल और नील की सहायता से वानर सेना सागर पर सेतु बना रही थी। श्रीराम ने जब उस दिव्य सेतु को देखा, तो उनके हृदय में गहरी श्रद्धा और आनंद की भावना हुई।
वे बोले — “यह स्थान अत्यंत पवित्र है, यहाँ भगवान शंकर की आराधना करनी चाहिए।”
श्रीराम ने स्वयं शिवलिंग की स्थापना की और भगवान शंकर का पूजन किया। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान राम और भगवान शंकर दोनों एक ही परम तत्व के भिन्न रूप हैं।
राम के वचनों से यह भी शिक्षा मिलती है कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है।
जो व्यक्ति शिवद्रोही है, वह रामभक्त नहीं हो सकता — यह भागवत धर्म का मूल संदेश है।
संदेश:
👉 राम और शिव एक ही हैं — “राम बिना शंकर नहीं, शंकर बिना राम नहीं।”
👉 सच्ची भक्ति में किसी देवता के प्रति द्वेष नहीं होना चाहिए।
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