लंका काण्ड चौपाई (110-117)

 लंका काण्ड चौपाई 110-117 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई:

देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।।

मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।।

कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।।

लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा।।

छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी।।

मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।।

बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।।

प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।।

भावार्थ :

 भगवान राम विभीषण  से कहते हैं— दक्षिण दिशा की ओर देखिए। बादलों का समूह घनघोर गरज रहा है, बिजली चमक रही है, जैसे तेज वर्षा होने को तैयार हो। 

तब विभीषण भगवान राम से कहते हैं कि यह वास्तविक बादल नहीं है, न ही यह बिजली है। यह रावण का विशाल महल है जो लंका के शिखर पर है और उसकी सैनिक सेना का अखाड़ा है।

रावण के सर पर मेघों के समान अति विशाल काला छत्र है, जो घनघोर बादलों की छाया जैसा प्रतीत होता है। मंदोदरी के कानों में झूलते ताटंक (बड़े कर्णफूल) बिजली की चमक जैसे दिखाई पड़ते हैं। सेना में बाजे, नगाड़े, ताल-मृदंग बज रहे हैं जिनकी ध्वनि बादलों के मधुर गर्जन जैसी सुनाई देती है। यह सब देखकर प्रभु राम मुस्कुराते हैं और  धनुष पर बाण चढ़ाते हैं।

विस्तृत विवेचन

१. प्रतीकात्मक वर्णन

तुलसीदास जी ने युद्ध-परिसर का अद्भुत उपमा अलंकारों से युक्त वर्णन किया है।

रावण का महल और सेना बादल और बिजली की तरह प्रकट होते हैं।

छत्र मेघ जैसा, ताटंक बिजली जैसा, मृदंग गर्जन जैसा—यह युद्ध की भयानकता का संकेत है।

२. विभीषण की दूरदर्शिता

विभीषण प्रभु राम को चेतावनी देते हैं कि दक्षिण दिशा की ओर शत्रु की विशाल तैयारी दिख रही है। इससे स्पष्ट होता है:

विभीषण रणनीतिक सलाहकार की भूमिका निभाते हैं।

वे राम के युद्ध में सहयोगी और मार्गदर्शक हैं।

३. राम की शांत वीरता

स्थिति देखकर राम मुस्कुराते हैं, क्योंकि वे निर्भय हैं।

बाण संधान करके वे युद्ध के आरंभ का संकेत देते हैं। यह बताता है कि सच्चा वीर भयभीत नहीं होता, बल्कि धैर्य और आत्मविश्वास से युक्त होता है।

४. आध्यात्मिक संकेत

रावण का अंहकार बादल के समान बड़ा, परंतु अस्थायी।

राम का बाण धर्म का प्रकाश, जो अंधकार को नष्ट करने वाला है।

निष्कर्ष

यह चौपाई युद्ध पूर्व की रोमांचक स्थिति, रावण का वैभव, दंभ का स्वरूप, तथा राम की दिव्य वीरता और शांत मनोबल का अद्भुत चित्रण है। विभीषण की बुद्धिमत्ता और राम की नीतिपूर्ण शक्ति—दोनों साथ मिलकर धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


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