लंका काण्ड चौपाई (126-133)

 लंका काण्ड चौपाई 126-133 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।।

भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।।

जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।।

श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी।।

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।।

आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।।

रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।।

उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।।

भावार्थ

श्रीराम का दिव्य स्वरूप अनंत और असीम है।

उनके चरण पाताल तक विस्तृत हैं और सिर ब्रह्मलोक तक।

उनके हर अंग में विभिन्न लोक विराजमान हैं।

उनकी भृकुटि का कंपन प्रलयकाल जैसा भयावह है।

उनकी आँखें सूर्य के समान तेजवान हैं और केश वर्षा के मेघों जैसे।

उनकी घ्राण शक्ति अश्विनी कुमारों जैसी दिव्य है।

उनके कान दसों दिशाओं में फैले हैं और वेदों का सार सुनते हैं।

उनकी श्वास वायु देव जैसी प्रचंड है और वाणी वेदों की मूल ध्वनि।

उनके दाँत यम के दाँतों जैसे भयंकर और माया हँसी से लोकपाल भयभीत हो जाते हैं।

उनके मुख में अग्नि, जीभ पर जल, और संपूर्ण शरीर में सृष्टि, पालन और संहार स्थित है।

शरीर के रोम अट्ठारह द्वीपों के समान, हड्डियाँ पर्वतों जैसी और नसें नदियों समान हैं।

उनका पेट समुद्र जैसा असीम है और ऐसा लगता है कि पूरा ब्रह्मांड उन्हीं में विद्यमान है।

➡️ निष्कर्ष

राम कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि साक्षात परमेश्वर हैं, जिनके शरीर में संपूर्ण सृष्टि स्थित है।

विवेचन

1️⃣ मंदोदरी की चेतावनी :मंदोदरी रावण को समझाती है—

“तुम जिस राम को साधारण मनुष्य समझकर युद्ध कर रहे हो, वे स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी हैं। उनसे शत्रुता तुम्हें विनाश की ओर ले जाएगी।”

2️⃣ राम का विश्वरूप यह वर्णन बताता है कि

राम परब्रह्म हैं — अलौकिक, सर्वशक्तिमान और सभी लोकों के आधार।

उनका स्वरूप मानवी बुद्धि से परे और वर्णनातीत है।

मुख्य संदेश

🌟 दिव्य सत्ता का अपमान अहंकार के अंत का कारण बनता है।

रावण यदि मंदोदरी की बात मान लेता, तो लंका

 और रावण दोनों का विनाश टल सकता था।

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