लंका काण्ड चौपाई (134-142)

लंका काण्ड चौपाई 134-142 का भावार्थ सहित विस्तृत उ:

बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।।

नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।

साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।।

रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।।

सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।।

जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।।

तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।।

मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ।।

भावार्थ :

मंदोदरी के उपदेश सुनकर रावण हल्का-सा मुस्कुराया और बोला— देखो मोह का प्रभाव कितना प्रबल होता है, जब किसी को लगाव हो जाता है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। सभी लोग कहते हैं कि स्त्रियों में आठ दोष स्वभावत: रहते हैं— साहस, झूठ, चंचलता, मायाचातुर्य, भय, विवेकहीनता, अशौच और दया का अभाव।

रावण कहता है— तुमने मेरे शत्रु राम के स्वरूप का अत्यधिक वर्णन किया और भयावह परिणाम सुनाए। परंतु तुम मेरी प्रिय पत्नी हो, इसलिए तुम्हारी बातें मैंने ध्यान से सुनीं। मैं समझ गया कि तुम चतुराई से मुझे शिक्षा देना चाहती हो। तुमने बड़े रहस्यमय और मधुर ढंग से अपनी बात कही, जो सुनने में सुखद लगी और भय मिटाने वाली थी।

लेकिन अंत में मंदोदरी के मन में विचार आता है कि रावण बुद्धिभ्रमित हो चुका है, काल (मृत्यु) ने उसके विवेक को हर लिया है, इसलिए वह सत्य नहीं समझ पा रहा है।

विस्तृत विवेचन

इस प्रसंग में मंदोदरी ने रावण को समझाया कि—

राम भगवान हैं, उनसे युद्ध करना विनाश को बुलाना है।

सीता को लौटा देने में ही भलाई है।

लेकिन अहंकारी रावण उपदेश को स्त्री-दोष का बहाना बनाकर टाल देता है और मंदोदरी की बुद्धिमत्ता को भी व्यंग्य में बदल देता है।

रावण का काल के वश होकर सत्य को न समझ पाना ही उसके पतन का प्रमुख कारण है।

मुख्य संदेश

1. अहंकार और मोह बुद्धि नष्ट कर देते हैं।

2. सत्य और हित की बात भी अहंकारी को कटु लगती है।

3. जब काल (विनाश) समीप होता है तो बुद्धि विपरीत चलती है। ("विनाश काले विपरीत बुद्धि")

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