लंका काण्ड दोहा (14)

 लंका काण्ड दोहा 14 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।

सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।।

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।

दोहा दो0-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान।

सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।।

भावार्थ :

प्रभु श्रीराम ने एक ही बाण से रावण के छत्र, मुकुट और ताटंक (कान के कुंडल) एक साथ काट गिराए। यह अद्भुत कौतुक सब देखकर सब लोग आश्चर्यचकित रह गए। वे वस्तुएँ पृथ्वी पर गिर पड़ीं, परंतु किसी को समझ में न आया कि यह चमत्कार कैसे हुआ।

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।

भावार्थ :

यह अद्भुत चमत्कार करके श्रीराम का बाण पुनः अपने तरकश में लौट आया। रावण की पूरी सभा भय से काँप उठी और सभा का सारा उत्साह नष्ट हो गया; क्योंकि सब समझ गए कि राम कोई साधारण मनुष्य नहीं, वे परम दिव्य शक्ति संपन्न भगवान हैं।

विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग लंका काण्ड में युद्ध के मध्य आता है, जब रावण अपनी शक्ति के मद में चूर होकर युद्धभूमि में खड़ा है। वह अपनी वीरता का घमंड करता है और सोचता है कि उसके सामने कोई टिक नहीं सकता।

परंतु भगवान राम के एक मात्र बाण ने उसके अहंकार का गर्व चूर्ण कर दिया।

प्रभु राम का एक ही बाण – छत्र, मुकुट और कानों के कुंडल को बिना रावण के शरीर को छुए काट देता है। यह अद्भुत कौशल, दिव्य बल और अचूक निशाने का परिचायक है।

वस्तुएँ धरती पर गिरती हैं, पर रावण और उसकी सेना स्तब्ध रह जाती है—कोई समझ नहीं पाता कि क्या हुआ।

बाण वापस तरकश में लौट आता है, जो दर्शाता है कि वह अग्नि की तरह नियंत्रणहीन नहीं, बल्कि बुद्धि और धर्म द्वारा संचालित दिव्य अस्त्र है।

रावण की सभा भयभीत होकर काँप उठती है, उसका सभी उत्साह, अभिमान और मनोबल टूट जाता है।

इस घटना से भगवान राम यह प्रमाणित करते हैं — विजय बल से नहीं, धर्म और मर्यादा से प्राप्त होती है।

दिव्य शक्ति और आशीष से समर्थ व्यक्ति को पराजित करना असंभव होता है।

संदेश

अहंकार का विनाश निश्चित है।

धर्म और संयम से किया गया युद्ध ही वास्तविक विजय देता है।

महान पुरुष अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि चमत्कारों से सत्य का मार्ग दिखाते हैं।

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