लंका काण्ड चौपाई (143-150)

 लंका काण्ड चौपाई 143-150 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।

कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।।

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।

मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।।

नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।।

बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।

बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।।

काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।

भावार्थ :

सुबह प्रभु श्रीराम उठकर मंत्रियों को बुलाते हैं और पूछते हैं—अब क्या उपाय किया जाए? जामवंत जी हाथ जोड़कर कहते हैं—हे सर्वज्ञ प्रभु! मेरी बुद्धि के अनुसार एक दूत (संदेशवाहक) भेजना उचित होगा। यह सलाह सबको पसंद आती है। तब श्रीरामजी अंगद को बुलाकर कहते हैं—हे बालि-पुत्र! तुम बुद्धि, बल और गुणों के भंडार हो, इसलिए मेरे कार्य की सिद्धि के लिए लंका जाओ। तुम्हें अधिक समझाने की जरूरत नहीं, मैं तुम्हें अत्यंत चतुर जानता हूँ। मेरे काम और रावण के हित दोनों इसी में है कि तुम उससे संदेश-वार्ता करो।

विस्तृत विवेचन

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।

सुबह होने पर श्रीराम जागते हैं और तुरंत अपने सचिवों/मंत्रियों को बुलाते हैं। यह दिखाता है कि राम राज्य-व्यवस्था जैसे अनुशासन का पालन युद्ध के समय भी करते हैं।

कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।।

राम उनसे शीघ्र उपाय पूछते हैं। जामवंत जी आदर के साथ प्रणाम कर अपनी राय देने को तैयार होते हैं।

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।

जामवंत राम की महिमा बताते हैं—हे प्रभो! आप तो सर्वज्ञ हैं, सभी के हृदय में स्थित हैं, बुद्धि, बल, तेज और धर्म के भंडार हैं

यह विनम्रता की शैली है—अपने इष्ट की महिमा कहकर अपने विचार प्रस्तुत करने का सुंदर तरीका।

मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।।

जामवंत अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देते हैं—पहले एक दूत भेजना चाहिए, और इसके लिए बालि-पुत्र अंगद सबसे उपयुक्त हैं।

नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।।

उनकी सलाह सबको पसंद आती है। श्रीराम अंगद को बुलाते हैं—यह भी दिखाता है कि राम तानाशाह नहीं, बल्कि सलाह को स्वीकार करने वाले आदर्श नायक हैं।

बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।

श्रीराम अंगद की प्रशंसा करते हैं—तुम बुद्धि, बल और गुणों से परिपूर्ण हो। इसलिए मेरे काम की पूर्ति हेतु लंका जाओ।

बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।।

राम कहते हैं—तुम्हें अधिक समझाने की आवश्यकता नहीं, मैं तुम्हें अत्यंत चतुर जानता हूँ। राम का यह वाक्य अंगद पर विश्वास का प्रतीक है।

काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।

राम कहते हैं—मेरी और रावण दोनों की भलाई इसी में है कि तुम उससे वार्ता करो और समझाओ।

युद्ध से पहले शांति का प्रयास राम का धर्म-सिद्धांत है।

मुख्य संदेश

1. नेतृत्व का आदर्श स्वरूप – निर्णय लेने से पहले मंत्रियों से सलाह करना।

2. संदेश-शांति का प्रयास – राम पहले दूत भेजकर रावण को समझाना चाहते हैं।

3. अंगद की योग्यता – बुद्धि, बल और नीति में श्रेष्ठ होने के कारण दूत बनते हैं।

4. राम का विश्वास – अपने योद्धाओं पर राम का भरोसा उनके नेतृत्व की महानता दर्शाता है।


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