लंका काण्ड दोहा (15)
लंका काण्ड दोहा 15 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु।
लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु।।14।।
1)भावार्थ :
“मेरे इन वचनों पर भरोसा कीजिए — रघुबंश का मणि (श्रीराम) विश्वरूप हैं। लोक की कल्पना और वेद भी यही कहते हैं कि उनके प्रत्येक अंग-अंग में लोक (संसार) विद्यमान है।”
2) विस्तृत विवेचन :
1. शब्द-शब्द खुलासा
बिस्वरुप = विश्वरूप (सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रूप)।
रघुबंस मनि = रघुकुल का मणि = श्रीराम, रघुवंश के शिर्ष-माणिक।
मनि करहु बचन बिस्वासु = मेरे कहे पर विश्वास करो।
लोक कल्पना बेद कर अंग-अंग प्रति जासु = लोकों की कल्पना और वेद भी कहें कि उनका हर अंग-अंग संसार का बोध कराता है / उसमें लोक समाए हुए हैं।
(यह शब्दार्थ अलग-अलग व्याख्याओं में सामान्यत: यही समझा जाता है।)
2. काव्यिक और दार्शनिक स्तर
ऊपर वाला स्तर (भक्ति/दैवत्व): यहाँ राम को न केवल मानव नायक बल्कि सार्वभौमिक देवत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया — “विश्वरूप” की परंपरा का स्पष्ट इशारा।
नीचे वाला स्तर (मानव/नैतिक): मन्दोदरी-प्रसंग में यह पंक्ति रावण को सचेत करने के लिये है — अतः यह चेतावनी भी है: ईश्वर/धर्म के विरुद्ध हठ न पकड़ो।
3. सन्दर्भ (Lanka-kand में जहाँ पंक्ति आई)
यह वह समय है जब मंदोदरी राम-गुण का वर्णन कर के रावण को समझाने की कोशिश कर रही है— मतलब भावभावना में यह पंक्ति राम के महत्त्व और उनकी सार्वभौमिकता को रेखांकित करती है, ताकि रावण का विरोध टाल सके।
4. अलंकार (रचनात्मकता) / शैली
अतिशयोक्ति — “अंग-अंग में लोक” कहकर राम के वैभव को भव्य रूप से दर्शाया गया।
धार्मिक प्रमाण-आधार — लोककथाओं (लोक कल्पना) और वेद का हवाला देकर वक्ता अपनी बात की सत्यता बढ़ाती है — यह तर्क और आस्था दोनों का मेल है।
भावात्मक प्रभाव — छोटी सी दोहा-लाइन में श्रद्धा, गंभीरता और चेतावनी कहीं-कहीं समाहित है — पाठक/श्रुत को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए उत्तम रचना।
5. नैतिक-शिक्षा / उपदेश
मनुष्यता पर भरोसा न रखकर दैवीय सत्ता को समझने की विनती; घमंड और हठ से बचने की गुंजाइश।
व्यक्ति-आत्मा को यह स्मरण कराना कि जो व्यक्ति (राम) धर्म के आदर्श हैं, वे केवल इंसान नहीं, समग्र ब्रह्मांड के प्रतिबिंब हैं — इसलिए विरोध करना मूर्खता है।
6. आधुनिक पठनीयता:
आज भी यह पंक्ति पाठकों को दो तरीके से छूती है: (a) भक्ति-भाव से — राम की महत्ता, और (b) दार्शनिक-भाव से — ईश्वर-सृष्टि की ऐक्यबोध। कई व्याख्याकार इसे ‘राम का विश्वरूप’ कह कर समझाते हैं।
3) संक्षेप में — तीन मुख्य बातें:
1. पंक्ति कहती है: राम विश्वरूप हैं — उनके हर अंश में संसार समाया है।
2. यह मंदोदरी/वक्तव्य-प्रसंग में रावण को चेताने वाली और श्रद्धा जगाने वाली पंक्ति है।
3. शैली में यह अतिशयोक्ति + धार्मिक प्रमाण का सुंदर मिश्रण है — दोनों भाव (आस्था और तर्क) इसे बल देते हैं।
Comments
Post a Comment