लंका काण्ड दोहा (16)
लंका काण्ड दोहा 16 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0 – अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान।
मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान।। 15(क) ।।
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।। 15(ख) ।।
भावार्थ (संक्षेप में)
हे प्राणनाथ! भगवान राम अहंकार के शत्रु हैं, और शिव, ब्रह्मा व चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ बुद्धि, मन और चित्त रखने वाले हैं। वे चराचर जगत रूप से युक्त मानव रूप में भगवान हैं। ऐसे प्रभु से वैर मत रखिए, उनके चरणों में प्रेम कीजिए— यही मेरी शुभकामना है।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा मंदोदरी द्वारा रावण को दिया गया उपदेश है। जब रावण श्रीराम के विरोध में अत्यधिक दुराग्रह दिखाता है, तब मंदोदरी उसे सत्य समझाने के लिए कहती है–
(क) भाग का विश्लेषण
"अहंकार सिव बुद्धि" – श्रीराम वह ईश्वर हैं जो अहंकार को नष्ट करने वाले हैं। जैसा शिव विषपान कर समस्त जगत की रक्षा करते हैं, वैसे ही राम दंभ और अहंकार का नाश करते हैं।
"अज मन ससि चित्त महान" – ब्रह्मा (अज), मन, चन्द्रमा और चित्त— इन सबका योग भी जिस बुद्धि से जीत नहीं सकता वह राम में विद्यमान है।
"मनुज बास सचराचर रूप" – वे भले ही मानव रूप में दिख रहे हों पर उनका स्वरूप समस्त सृष्टि— चर और अचर— का अधिष्ठाता है।
"राम भगवान" – यहां मंदोदरी स्पष्ट कहती है कि श्रीराम केवल राजा नहीं, ईश्वर अवतार हैं।
(ख) भाग का विश्लेषण
"अस बिचारि सुनु प्रानपति" – मंदोदरी विनयपूर्वक रावण को अपने प्राणों के स्वामी कहकर समझाती है।
"प्रभु सन बयरु बिहाइ" – भगवान से विरोध करना विनाश को आमंत्रण है।
"प्रीति करहु रघुबीर पद" – श्रीराम के चरणों में शरण ग्रहण करो।
"मम अहिवात न जाइ" – यह मेरा शुभ आशीर्वाद है कि तुम विनाश के मार्ग से लौट आओ।
सार तत्व
यह दोहा भक्ति, सत्य और सद्बुद्धि का सुंदर संदेश देता है—
अहंकार मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है, जबकि ईश्वर की शरण उसे बचा लेती है।
मंदोदरी जैसे दुर्लभ चरित्र ही सत्य बोलने का साहस रखते हैं।
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