लंका काण्ड चौपाई (161-168)

लंका काण्ड चौपाई 161-168 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

चौपाई

तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।

सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।।

आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।।

अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।।

भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।।

मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।।

गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।।

उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रौध बिसेषी।।

भावार्थ

जब अंगद लंका में पहुँचे, तब राक्षसों ने तुरंत एक दूत को रावण के पास भेजा। दूत ने रावण को समाचार दिया कि एक वानर दूत आया है। यह सुनकर रावण हँसते हुए बोला—“उस बंदर को पकड़कर यहाँ ले आओ।” आज्ञा पाकर बहुत से दूत दौड़े और उस महाबली वानर अंगद को सभा में ले आए।

अंगद को देखकर रावण ऐसा लगा मानो प्राणों सहित काजल पर्वत सामने बैठा हो। उसकी भुजाएँ वृक्षों के समान, सिर पर्वत-शिखर जैसा, शरीर के रोम लताओं जैसे प्रतीत हो रहे थे। उसका मुख, नासिका, नेत्र और कान पर्वत की गुफाओं के समान भयंकर लग रहे थे। अंगद निर्भय होकर सभा में पहुँचा, उसके मन में तनिक भी भय नहीं था। बालि का यह पुत्र अत्यंत बलशाली और वीर था। उसे देखकर सभी सभासद खड़े हो गए और रावण के हृदय में विशेष क्रोध उत्पन्न हो गया।

विस्तृत विवेचन

1. रावण का अहंकार

यहाँ रावण का अहंकार स्पष्ट दिखता है। अंगद जैसे वीर दूत को वह “कीसा” (बंदर) कहकर तुच्छ समझता है। यह उसका मदांध स्वभाव दर्शाता है।

2. अंगद का विराट व्यक्तित्व

तुलसीदास जी ने अंगद के शरीर का पर्वत से बार-बार उपमान देकर वर्णन किया है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि अंगद साधारण दूत नहीं, बल्कि राम-बल का सजीव प्रतीक है।

3. निर्भयता का आदर्श

अंगद शत्रु की सभा में जाकर भी तनिक भयभीत नहीं होता। यह रामभक्त की निर्भीकता और धर्मबल को दर्शाता है।

4. सभासदों की प्रतिक्रिया

अंगद को देखकर सभी सभासद उठ खड़े होते हैं—यह उसके तेज, बल और प्रभाव का संकेत है। शत्रु भी उसके प्रताप से प्रभावित हो जाते हैं।

5. रावण का अंतःक्रोध

बाहरी हँसी के बाद भीतर से रावण का क्रोध बढ़ना यह बताता है कि सत्य और धर्म का तेज अधर्म को भीतर से जला देता है।

सार

यह चौपाई अंगद के शौर्य, निर्भीकता और प्रभाव का चित्रण करती है तथा रावण के अहंकार और अधर्म की मानसिकता को उजागर करती है। यहाँ से आगे लंका में धर्म और अधर्म का टकराव और भी स्पष्ट होता जाता है।

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