लंका काण्ड चौपाई (169-176)
लंका काण्ड चौपाई 169-176 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
चौपाई
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।
मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।।
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।।
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।।
नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।।
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।।
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।।
सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।
भावार्थ:
रावण के पुछने पर कि तुम कौन हो,बंदर?
अंगद रावण से कहते हैं—
“हे दसकंठ! मैं कोई साधारण वानर नहीं, मैं रघुबीर श्रीराम का दूत हूँ। मेरे पिता (बालि) और तुम में मित्रता थी। मैं तुम्हारे हित के लिए ही यहाँ आया हूँ। तुम्हारा कुल अत्यंत श्रेष्ठ है—तुम पुलस्त्य ऋषि के वंशज हो, शिव और ब्रह्मा के उपासक हो, वरदान पाकर लोकपालों तक को जीत चुके हो।
परंतु राजाओं के अभिमान और मोहवश तुमने भगवान की माया-शक्ति सीता जी का हरण कर लिया। अब मेरी शुभ बात सुनो—अपने अपराध स्वीकार करो, प्रभु राम से क्षमा माँगो, हाथ में तिनका लेकर दीन भाव से चलो और जनकनंदिनी सीता को ससम्मान लौटा दो। ऐसा करोगे तो समस्त भय से मुक्त हो जाओगे।”
🔹 विस्तृत विवेचन
यह चौपाई अंगद की नीति, धर्म और करुणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। वे रावण को तुच्छ नहीं कहते, बल्कि उसके गुणों और महान कुल की स्मृति दिलाते हैं।
1. दूत का परिचय और उद्देश्य
अंगद स्पष्ट करते हैं कि वे शत्रु नहीं, बल्कि हितैषी दूत हैं। यह धर्मयुक्त संवाद की मर्यादा है।
2. रावण के गुणों का स्मरण
पुलस्त्य वंश, शिव-भक्ति, ब्रह्मा की कृपा और लोकविजय—इन सबका उल्लेख कर अंगद बताते हैं कि रावण पतन योग्य नहीं, बल्कि भ्रमित हुआ महान व्यक्ति है।
3. पतन का कारण
अंगद कहते हैं कि अभिमान और मोह ने रावण को अंधा कर दिया, जिसके कारण उसने जगदंबा स्वरूपा सीता जी का हरण किया।
4. उपदेश और समाधान
अंगद सरल उपाय बताते हैं—
अपराध स्वीकार करो
दीन भाव से क्षमा माँगो
सीता जी को ससम्मान लौटा दो
5. भक्ति का आदर्श
“दसन गहहु तृन” का अर्थ है पूर्ण शरणागति। राम का धर्म ऐसा है कि शरणागत को वे अवश्य क्षमा करते हैं।
🔹 संदेश
यह चौपाई सिखाती है कि महानता कुल या शक्ति से नहीं, विनय और धर्म से होती है। अहंकार पतन का कारण है और शरणागति ही मुक्ति का मार्ग।
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