लंका काण्ड दोहा और सोरठा (17)
लंका काण्ड दोहा और सोरठा 17 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा 16(क)
दोहा:
“एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।
सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।।”
भावार्थ
इस प्रकार (मन्दोदरी द्वारा दी गई शिक्षाओं और अपशकुनों के संकेतों को) सुनकर भी रावण ने इसे हँसी और खेल की बात समझकर बहुत समय तक विनोद करता रहा।
प्रातःकाल वह लंका का स्वामी रावण, जो स्वभाव से ही निर्भीक और अहंकार के मद में अंधा था, गर्व से भरा अपनी सभा में उपस्थित हुआ।
विस्तृत विवेचन
रावण के सामने लगातार अपशकुन और चेतावनियाँ आ रही थीं—मंदोदरी समझा रही थीं कि श्रीराम भगवान हैं और उनसे बैर न करो।
परंतु अहंकार बुद्धि को अंधा बना देता है, इसलिए रावण ने किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लिया।
उसका स्वभाव था–साहस, अभिमान और अविवेक, इसलिए वह अनहोनी की आहट नहीं समझ सका।
नशा, शक्ति, ऐश्वर्य और विजय की आदत उसे असावधान बना चुकी थी।
यही कारण है कि वह प्रातःकाल सभा में आता है, मानो कोई बड़ी विजय प्राप्त करने जा रहा हो—जबकि विनाश उसके सिर पर खड़ा था।
निष्कर्ष:
जिस व्यक्ति में अहंकार भर जाता है, वह शुभ–अशुभ का विचार नहीं कर पाता और विनाश की ओर चल पड़ता है।
> “विनाश काले विपरीत बुद्धि।”
सोरठा 16(ख)
सोरठा:
“फूलहँ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद।
मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।।16(ख)।।”
भावार्थ
जैसे बेंत (बाँस) के वृक्ष पर भले ही अमृत की वर्षा भी क्यों न हो, फिर भी वह फूल और फल नहीं सकता—उसी प्रकार मूर्ख हृदय वाले मनुष्य को यदि ब्रह्मा जैसे महान गुरु भी मिल जाएँ, तब भी वह नहीं समझ सकता।
विस्तृत विवेचन
बाँस की प्रकृति ऐसी है कि वह कितना भी सिंचित हो, कभी फल नहीं देता—क्योंकि उसका स्वभाव ही निष्फल है।
उसी प्रकार मूर्ख और अहंकारी मनुष्य का मन भी कठोर और अज्ञान से भरा रहता है।
श्रेष्ठ गुरु, उत्तम उपदेश, उत्तम अवसर—कुछ भी उसे बुद्धिमान या जाग्रत नहीं कर पाते।
रावण यहाँ बाँस के समान मनुष्य का प्रतीक है—जिसको स्वयं ब्रह्मा भी समझाएँ तो भी वह नहीं मान सकता।
गुरु की महत्ता तभी होती है जब शिष्य विनम्र और ग्रहणशील हो।
सार / निष्कर्ष
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो विवेक को नष्ट कर देता है।
मूर्ख और अहंकारी व्यक्ति को उपदेश देना व्यर्थ है—वह विनाश का मार्ग स्वयं चुन लेता है।
रावण की मृत्यु का असली कारण केवल श्रीराम के बाण नहीं, बल्कि उसका अभिमान और अविवेक था।
संदेश
जीवन में गुरु का महत्व तभी है जब मन में विनम्रता
और ग्रहणशीलता हो।
चेतावनी और शुभ परामर्श को अनसुना करना विनाश का सूचक है।
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