लंका काण्ड चौपाई (177-186)

 लंका काण्ड चौपाई 177-186 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।

कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई।।

अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।।

अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।।

अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।।

गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।।

अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।।

दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।।

राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।।

सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें।।

भावार्थ :

रावण अंगद से कहता है—

“अरे वानर! सँभलकर बोल। तू मुझे देवताओं का शत्रु नहीं जानता।

अपना नाम बता और अपने पिता का नाम बता और किस कारण से तुम्हारे पिता के साथ मेरी मित्रता थी, यह भी बता।

अंगद उत्तर देता है—

“मेरा नाम अंगद है। मैं बालि का पुत्र हूँ। क्या कभी बालि से तुम्हारी भेंट हुई थी?”

अंगद की बात सुनकर रावण सकुचाता है और कहता है—

“हाँ, मैं बालि को जानता हूँ।”

अंगद कहता है—

“तुम बालि के पुत्र से बात कर रहे हो। तुम उसी वंश में उत्पन्न हुए हो जो अपने ही कुल का नाश करने वाला है।

तुम व्यर्थ ही यहाँ नहीं आए हो, अपने को तपस्वी का दूत बताकर आए हो।”

फिर अंगद पूछता है—

“अब बताओ, बालि का हालचाल कैसा है?”

यह सुनकर रावण हँसता है। तब अंगद कहता है—

“दस दिन पहले ही मैं बालि के पास गया था और मित्रभाव से उसका कुशल-क्षेम पूछा था।

पर जो राम का विरोधी होता है, उसका कुशल कभी नहीं हो सकता—यह बात तुम्हें वही बताएगा।”

अंत में अंगद कहता है—

“सुन रे मूर्ख! जिसके मन में भेद (द्वेष) है, उसके हृदय में श्रीराम कभी नहीं बसते।

विस्तृत विवेचन

यह प्रसंग अंगद–रावण संवाद का है, जहाँ अंगद श्रीराम के दूत के रूप में लंका सभा में निर्भीक होकर सत्य और धर्म का उद्घोष करता है।

1. रावण का अहंकार और अज्ञान

रावण अंगद को तुच्छ समझकर कठोर वचन बोलता है। उसका अहंकार इतना बढ़ चुका है कि वह सत्य और धर्म को पहचानने की क्षमता खो बैठा है। “सुरारी” कहकर वह अपने बल का दंभ करता है।

2. अंगद का आत्मसम्मान और निर्भीकता

अंगद बिना भय के अपना परिचय देता है—“मैं बालि का पुत्र हूँ।”

यहाँ अंगद का उद्देश्य रावण को यह स्मरण कराना है कि बालि जैसा पराक्रमी भी राम के प्रताप के सामने टिक न सका।

3. कुलघात का संकेत

“बंस अनल कुल घालक” — अंगद रावण को चेतावनी देता है कि वह अपने ही वंश का नाश करने वाला बन गया है। यह रावण के अधर्म, अहंकार और राम-विरोध का परिणाम है।

4. राम-विरोध का फल

अंगद स्पष्ट कर देता है कि जो श्रीराम का विरोधी है, उसका कभी मंगल नहीं हो सकता। यह तुलसीदास जी का गूढ़ सिद्धांत है—

राम-विमुखता = विनाश।

5. भेद (द्वेष) का परिणाम

अंतिम पंक्ति इस चौपाई का सार है—

जिसके मन में कपट, द्वेष और अहंकार है, उसके हृदय में भगवान राम का वास नहीं हो सकता।

राम केवल प्रेम, विनय और समर्पण से प्राप्त होते हैं।

शिक्षा / संदेश

अहंकार मनुष्य को सत्य से दूर कर देता है।

राम-विरोध का अंत सदा विनाश होता है।

निर्भीक सत्य-वचन ही सच्चे

 दूत की पहचान है।

जहाँ भेद और द्वेष है, वहाँ ईश्वर का वास नहीं।



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