लंका काण्ड सोरठा (18)
लंका काण्ड सोरठा 18 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन,:
सो0-प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।।
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
भावार्थ :
भगवान राम की आज्ञा पाकर अंगद रावण के यहां दूत बनकर जाने को तैयार हुआ है और यह सोरठा उसी संदर्भ में है:-
प्रभु (राम) की आज्ञा पाकर अंगद, जो सिर धरकर चरणों में नतमस्तक था, उठा। वह (अंगद) गुणों का सागर है — और यह सब राम की कृपा की वजह से है।
खुद प्रभु ने सब काम सिद्ध किए और मुझे मान दिया; ये सोचकर जुबराज (राजपूत/उच्च अधिकारी/आत्मा) का तन उल्लासित हुआ और हृदय आनंद से भर गया।
विस्तृत विवेचन
1. पंक्ति-वार वाक्य-वितरण और अर्थ
“प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।”
प्रभु अग्या धरि = प्रभु की आज्ञा पाते ही / जब राम ने आदेश दिया।
सीस चरन बंदि = सिर चरन पर बाँधना — यहाँ का भाव नतमस्तक होना/पूरी श्रद्धा से शीश जोड़कर चरण स्पर्श करना है (गहरे प्रणाम का चित्र)।
अंगद उठेउ = उस प्रणाम के बाद अंगद उठे — अर्थात आज्ञा मिलते ही वह उठकर आगे बढ़ा या व्यवस्थित हुआ।
संदर्भ भाव: अंगद की अब्ज नम्रता और आज्ञापालन — वह पहले नमस्कार कर रहा था, राम की आज्ञा से उठकर काम को ग्रहण करता है।
“सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।”
सोइ गुन सागर = वही (अंगद) गुणों का सागर — अंगद के गुणों की प्रशंसा।
ईस राम कृपा जा पर करहु = ये सब (उसका यही महान गुण) राम की कृपा पर हुए/राम की कृपा से स्थापित हैं।
संदेश: निःस्फंद प्रशंसा — गुण किसी व्यक्तित्व की अपनी ही नहीं, भगवान की कृपा का फल हैं; सर्वशक्तिमान के अनुग्रह को कारण बताया जा रहा है।
“स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।”
स्वयं सिद्ध सब काज = स्वयं (भगवान ने) सारे काम सिद्ध कर दिए / अपने श्रम से सब सिद्ध कर दिये।
नाथ मोहि आदरु दियउ = मेरे प्रति सम्मान/आदर प्रदान किया।
संदर्भ भाव: अंगद कहता है कि सब कुछ प्रभु ने पूरा किया और उन्होंने मुझे आदर दिया — यह आनन्द-विवेचना है।
“अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।”
अस बिचारि = ऐसा देखकर / ऐसा सोचकर।
जुबराज = (“अंगद किष्किंधा का युवराज है का अर्थ राजा/प्रमुख)। संदर्भानुसार यह वह व्यक्ति हो सकता है जो सम्मान पाकर आनन्दित हुआ ।
तन पुलकित हरषित हियउ = तन (शरीर) झूम उठा/खुश हुआ, हृदय आनंदित हुआ।
भाव: राम की कृपा और सम्मान देखकर राजकीय/मानसिक उल्लास — भावनात्मक उत्कर्ष का चित्रण।
2. साहित्यिक-तत्त्व और शैली
उपमा/अतिशयोक्ति: अंगद को गुन सागर कहा गया — गुणों की विशालता को बढ़ाने के लिये।
भाव प्रधानता: क्रिया-केंद्रित वाक्य (आज्ञा → प्रणाम → उठना → कृपा) — भक्ति-रूपक अनुक्रम दिखता है।
संबोधन का गौरव: “प्रभु” और “नाथ” से परमात्मा की सर्वशक्तिमत्ता व करुणा का स्मरण।
भाव-परिवर्तन: पहले नम्रता, फिर प्रभु की कृपा का परिस्फुटन, अंत में हर्षोन्माद — कहानी का उत्साह बढ़ता है।
3. कथानक/सामाजिक-संदर्भ
यह श्लोक राम-भक्ति व अनुशासन का प्रत्यय है: वीरता के साथ भी वानर-नेता नतमस्तक रहते हैं और सारा फल—सम्मान, सफलता—भगवान की कृपा से जोड़ते हैं।
राम की आज्ञा का पालन और उनकी कृपा से मिलने वाला मान—यह दो प्रमुख गुण यहाँ उभर कर आते हैं। शिविर/सभा में प्रकट होने वाला हृदय-उल्लास लोक-नाटकीयता भी बढ़ाता है।
4. नैतिक-दृष्टि / उपदेश (मुख्य सीख)
नम्रता + आज्ञापालन: श्रेष्ठ गुण होते हुए भी विनम्र रहना — और गुरु/प्रभु की आज्ञा का पालन।
कृतज्ञता: जो सम्मान/गुण हमें प्राप्त हैं, उन्हें आत्म-कर्म का नहीं, ईश्वर की कृपा का फल मानना — यह भाव भक्ति को शुद्ध करता है।
आनन्द-प्रकाश: प्रभु-कृपा का अनुभव व्यक्तिगत ही नहीं, आसपास के लोगों/दरबार में भी उल्लास उत्पन्न कर देता है।
5. शब्द-व्याख्या
सीस चरन बंदि = शीश अपने चरणों पर रखकर पूरी विनय के साथ प्रणाम।
गुन सागर = गुणों का अथाह सागर (बहुतायत)।
स्वयं सिद्ध = स्वयं पूरा/सफल कर देना।
पुलकित = रोमांचित/विनोद से आलौकिक खुशी महसूस करना।
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