लंका काण्ड चौपाई (187-194)

 लंका काण्ड चौपाई 187-194 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।

तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।।

सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।।

खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।।

कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।।

देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।।

कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।।

धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।।

भावार्थ :

अंगद जी रावण से कहते हैं—

जिस प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा शिव, ब्रह्मा, देवता और मुनिगण चाहते हैं,

उसी प्रभु का दूत बनकर आना हमारे लिए गौरव की बात है, लज्जा की नहीं।

ऐसी बुद्धि तुम्हारे हृदय में नहीं आती।

अंगद की यह कठोर व निर्भीक वाणी सुनकर रावण क्रोध से आँखें तरेरता हुआ कहता है—

“हे वानर! तुम्हारे कटु वचनों को मैं सह रहा हूँ, क्योंकि मैं नीति-धर्म जानता हूँ।”

अंगद पर कटाक्ष करते हुए रावण कहता है—

“तुम्हारी धर्मशीलता की चर्चा सुनी है, तुमने परायी स्त्री का अपहरण किया था।”

अंगद प्रत्युत्तर देते हैं—

“मैंने स्वयं देखा है कि दूत की रक्षा करनी चाहिए,

फिर भी तुम धर्मव्रती होकर न डूबे, न मरे।”

अंगद आगे कहते हैं—

“तुमने अपनी बहन शूर्पणखा को नाक-कान कटे देखा,

फिर भी धर्म-विचार करके उसे क्षमा किया।”

इस पर रावण व्यंग्यपूर्वक कहता है—

“तुम्हारी धर्मशीलता जगत में प्रसिद्ध है,

आज तुम्हारा दर्शन पाकर मैं भी बड़ा भाग्यशाली हो गया।”

🔹 विस्तृत विवेचन

1️⃣ अंगद का निर्भय धर्मबोध

अंगद जी बालि पुत्र होते हुए भी राजदूत की मर्यादा और

राम-प्रताप का पूर्ण ज्ञान रखते हैं।

वे रावण को स्पष्ट बताते हैं कि

राम का दूत होना ही सबसे बड़ा कुल-गौरव है।

➡️ यहाँ अंगद का क्षात्र तेज, बुद्धि और धर्मनिष्ठा प्रकट होती है।

2️⃣ रावण का दिखावटी नीति-ज्ञान

रावण स्वयं को नीति-धर्म का ज्ञाता कहता है,

पर उसका जीवन अधर्म, अहंकार और स्त्री-अपहरण से भरा है।

वह सत्य सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करता।

➡️ यह ज्ञान और आचरण के अंतर को दिखाता है।

3️⃣ दूत-धर्म का उल्लंघन

अंगद रावण को संकेत देते हैं कि उसने

– दूत का अपमान किया,

– धर्म-मर्यादा तोड़ी,

– और अधर्म को नीति कहकर ढकने का प्रयास किया।

4️⃣ रावण का विरोधाभास

रावण अंगद की धर्मशीलता की प्रशंसा करता है,

पर स्वयं धर्म को अपनाने का साहस नहीं करता।

➡️ यही उसके पतन का मूल कारण है।

🔹 इस प्रसंग की मुख्य शिक्षा

धर्म ज्ञान नहीं, आचरण है।

अहंकार बुद्धि को अंधा कर देता है।

प्रभु राम का दूत होना ही सर्वोच्च गौरव है।


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