लंका काण्ड दोहा (19)
लंका काण्ड दोहा 19 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दोहा – 18 (लंका काण्ड)
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।
भावार्थ :
अंगद भगवान राम के चरण-कमलों को स्मरण करते हुए रावण की सभा में प्रवेश करता है। वह सिंह के समान दृढ़ और वीर भाव से इधर-उधर देखता है। उसका साहस, धैर्य और अपार शक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
विस्तृत विवेचन
1. “गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।”
अंगद जब रावण की सभा में प्रवेश करते हैं, तो वे पहले श्रीराम के चरणों का स्मरण करते हैं—
यह भक्ति और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है।
दूत होने के कारण उनके भीतर कोई अहंकार नहीं, बल्कि प्रभु पर पूर्ण श्रद्धा है।
यह संदेश है कि संकट में सदैव ईश्वर का स्मरण साहस बढ़ाता है।
अंगद जानते थे कि रावण के दरबार में जाना साधारण कार्य नहीं है, फिर भी श्रीराम की कृपा को स्मरण कर वे निर्भीक बने रहे।
2. “सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।”
यह पंक्ति अंगद के व्यक्तित्व का अत्यंत प्रभावशाली चित्र खींचती है—
अंगद का चाल-ढाल सिंह के समान था: गर्वीला, तेजस्वी और निर्भय।
वे इधर-उधर देखते हैं, लेकिन डरकर नहीं, बल्कि वीर के आत्मविश्वास के साथ।
उनकी उपस्थिति भर से रावण की सभा में एक अलग ही गंभीरता पैदा हो जाती है।
“धीर वीर बल पुंज” — अंगद धैर्य, वीरता और बल का सजीव रूप हैं।
इस वर्णन के द्वारा तुलसीदास यह दिखाते हैं कि सच्चा वीर वही है जो संकट में भी विवेक, धैर्य और प्रभु-स्मरण बनाए रखे।
सार
यह दोहा केवल अंगद की वीरता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संदेश भी देता है—
भक्ति + वीरता = अदम्य शक्ति
अंगद का व्यक्तित्व भक्त-वीर की सर्वोच्च मिसाल बनकर प्रस्तुत होता है।
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