लंका काण्ड चौपाई (195-204)
लंका काण्ड चौपाई 195-204 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।
तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।।
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।।
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।।
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।।
आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।।
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।।
रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।।
जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।।
चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।
भावार्थ:
रावण अंगद से कहता है—“हे अंगद! मेरी बात ध्यान से सुन। मुझसे युद्ध करने वाला ऐसा कौन-सा योद्धा है? तुम्हारे स्वामी राम तो नारी-वियोग से दुर्बल हो गए हैं और उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी शोक से मलिन हैं। तुम और सुग्रीव दोनों एक ही कुल के हो; मेरा छोटा भाई (विभीषण) भी अत्यंत कायर है। जामवंत जैसा मंत्री बहुत बूढ़ा है, वह अब युद्ध में कैसे चढ़ेगा? नल-नील तो केवल निर्माण-कला जानते हैं। एक ही कपि (हनुमान) है जो बड़ा बलवान है। जिसने पहले आकर नगर जलाया, वही कपि था—यह बात सच है। अंगद कहताहै :पर इतने बड़े रावण के नगर को एक छोटे से कपि ने जला दिया—यह सुनकर भी जो सच कहे, वही सत्यवादी है। जिस योद्धा की तुम बहुत प्रशंसा करते हो, वह तो सुग्रीव का छोटा सा दूत है। जो बहुत दौड़-भाग करता है, वही सच्चा वीर नहीं होता; इसलिए मैंने उसे केवल समाचार लेने भेजा था।”
विस्तृत विवेचन
रावण का दर्प और आत्ममुग्धता
इस प्रसंग में रावण का अहंकार चरम पर दिखाई देता है। वह अपने बल, ऐश्वर्य और सेना के गर्व में राम-पक्ष को तुच्छ बताकर अंगद को भयभीत करना चाहता है। उसका उद्देश्य अंगद के मन में संदेह पैदा करना है।
राम-लक्ष्मण पर व्यंग्य
रावण राम को सीता-वियोग से दुर्बल और लक्ष्मण को शोकग्रस्त बताकर उनकी वीरता पर प्रश्न उठाता है। यह उसकी अज्ञानता है, क्योंकि राम-लक्ष्मण का धैर्य और धर्मबल ही उनके वास्तविक अस्त्र हैं।
वानर-सेना का अपमान
वह सुग्रीव, अंगद, जामवंत, नल-नील आदि का उपहास करता है—किसी को कायर, किसी को बूढ़ा, किसी को केवल कारीगर बताता है। इससे रावण का मिथ्या अभिमान और दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति प्रकट होती है।
हनुमान की अप्रत्यक्ष प्रशंसा
हनुमानजी की प्रशंसा करने पर अंगद कहता है: रावण, हनुमान तो राम का भेजा हुआ छोटा सा वानर है, क्या उसी ने लंका जलाई। अनजाने में वह हनुमान की शक्ति और साहस की सच्चाई को स्वीकार कर लेता है।
सत्य और भ्रम का द्वंद्व
अंगद कहता है कि “जो सच कहे वही सत्यवादी है”, पर स्वयं उसी सत्य को कमतर दिखाने की चेष्टा करता है। यह उसके पतन का संकेत है—सत्य सामने होते हुए भी अहंकार के कारण वह उसे स्वीकार नहीं करता।
धर्म-अधर्म का संकेत
यह चौपाई दर्शाती है कि अहंकार में डूबा व्यक्ति दूसरों की शक्ति को नहीं पहचान पाता। रावण का यही दर्प अंततः उसके विनाश का कारण बनता है, जबकि राम-पक्ष का विनय, धैर्य और सत्य उन्हें विजय दिलाता है।
निष्कर्ष:
यह चौपाई रावण के घमंड, वानर-सेना के प्रति तिरस्कार और सत्य को न समझ पाने की त्रुटि को उजागर करती है। तुलसीदास जी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि बाहरी बल नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और विनय ही वास्तविक शक्ति हैं।
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