लंका काण्ड दोहा (20)
लंका काण्ड दोहा 20 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
दो0-जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ।
राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।।
भावार्थ
अंगद रावण के दरबार में इस तरह पहुंचता है जिस प्रकार मतवाले हाथियों के समूह में सिंह (पंचानन) के आ जाने से सब हाथी भयभीत होकर शांत हो जाते हैं, उसी प्रकार राम के प्रताप का स्मरण करते ही लंका की सभा में उपस्थित सभी राक्षस अहंकार छोड़कर सिर झुकाकर बैठ गए।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा लंका की सभा के मनोभाव को प्रकट करता है। यहाँ तुलसीदास जी एक अत्यंत सशक्त उपमा देते हैं।
मतवाले हाथी अहंकार, बल और उन्माद के प्रतीक हैं।
सिंह (पंचानन) धर्म, साहस और सर्वोच्च शक्ति का प्रतीक है।
जैसे ही सिंह हाथियों के समूह में प्रवेश करता है, वैसे ही राम के प्रताप का स्मरण मात्र राक्षसों के हृदय में भय और विवेक जगा देता है। यहाँ राम का प्रताप शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति के रूप में प्रकट होता है।उसी प्रकार अंगद के सभा में पहुंचने पर सभी राक्षस भयभीत और शांत हो कर बैठ गया।
सभा में बैठे राक्षस बाहरी रूप से बलवान हैं, परंतु राम के नाम और यश का स्मरण होते ही उनका मद, गर्व और उन्माद नष्ट हो जाता है। वे समझ जाते हैं कि राम केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि साक्षात धर्म और सत्य के अवतार हैं।
इस दोहे से यह शिक्षा मिलती है कि—
> अधर्म का कितना भी बल क्यों न हो, धर्म का स्मरण मात्र ही उसे नतमस्तक कर देता है
राम का प्रताप तलवार से नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और सत्य से संसार को जीतता है।
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