लंका काण्ड चौपाई (205-220)
लंका काण्ड चौपाई 205-220 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।।
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।।
मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।।
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।।
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।।
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।।
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।।
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।।
कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।।
बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।।
खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।।
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।।
कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।
भावार्थ
इन चौपाइयों में अंगद और रावण के बीच संवाद है।
रावण अंगद को कहता है कि तुम्हारे बंदर जाति की विशेषता है कि वह स्वामीभक्त होता है और अपने स्वामी के लिए लाज छोड़कर जहां-जहां नाचता फिरता है।नाच-कूद कर लोगों को रिझाता है। तुम्हारी जाति हीं स्वामीभक्त होता है, इसलिए तुम अपने प्रभु (राम) की प्रशंसा क्यों नहीं करोगे।
इस पर अंगद रावण से कहता है कि तुम्हारे गुणों की प्रशंसा हनुमान जी ने मुझे सुनाया है। तुम्हारे बगीचे को उजार दिया, तुम्हारे पुत्र को मार दिया, लंका को जला दिया। फिर भी तुम्हारा कोई नुक्सान नहीं किया। तुम्हारी प्रकृति को देखकर हीं मैंने ऐसी बात कही। हनुमानजी ने कहा था कि तुम्हें लाज और रोष दोनों हीं नहीं है।
इस पर रावण हंसते हुए कहा कि अपने माता-पिता को तुम खा गए हो।
इस पर अंगद ने कहा कि पिता को खाने के बाद तुम्हें हीं खाने की इच्छा है, परंतु बालि की यश के कारण मैं तुम्हारा बध नहीं कर रहा हूं। तुम कौन-सा रावण हो, जिसे राजा बलि जीतकर पाताल ले गए और अपने घुड़साल में बांधकर रख दिया। जिसे बालक खेल करते और मारते थे। फिर राजा बलि को दया आई और उन्होंने ने छुड़ाया। एक रावण को सहस्रबाहु ने विशेष जंतु समझकर पकड़कर अपने महल ले आया। फिर पुलस्त्य ऋषि उन्हें छुड़ाकर लाया।
अंगद ने एक दूत का कार्य अच्छी तरह निभाया।।
तुलसीदास जी यहाँ संकेत देते हैं कि
भक्ति के आगे बल, वंश और अहंकार सब तुच्छ हैं।
रावण का यही अहंकार आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनता है।
🔹 सार
हनुमान = आदर्श भक्त
अंगद = नीति और धर्म के प्रतिनिधि
रावण = अहंकारयुक्त पराक्रमी, पर विवेकहीन
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