लंका काण्ड दोहा (21)
लंका काण्ड दोहा 21 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।
भावार्थ :
हे रघुवंश के शिरोमणि श्रीराम! आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं। अब मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए। जब प्रभु श्रीराम किसी भी दुखी और शरणागत की करुण पुकार सुनते हैं, तो उसे तुरंत भयमुक्त कर देते हैं।
विस्तृत विवेचन
यह दोहा शरणागति के महान सिद्धांत को स्पष्ट करता है। यहाँ भयभीत होकर श्रीराम की शरण ली जा रही है। “त्राहि त्राहि” शब्द यह दर्शाता है कि शरण लेने वाला पूर्णतः असहाय हो चुका है और अब उसके पास प्रभु के अतिरिक्त कोई सहारा नहीं है।
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“प्रनतपाल” कहकर यह बताया गया है कि श्रीराम का स्वभाव ही शरणागत की रक्षा करना है। वे किसी की योग्यता नहीं देखते, केवल उसकी आर्त पुकार सुनते हैं। जैसे ही दुखी हृदय से पुकार उठती है, प्रभु करुणा से भर जाते हैं।
इस दोहे में यह भी संदेश है कि प्रभु की शरण में आने के बाद भय का कोई स्थान नहीं रहता। श्रीराम स्वयं वचन देते हैं कि जो भी उनकी शरण में आएगा, उसे वे अभय प्रदान करेंगे।
लंका काण्ड के संदर्भ में यह दोहा यह सिद्ध करता है कि चाहे परिस्थिति कितनी भी भयावह क्यों न हो, राम-शरण ही परम सुरक्षा है। यह दोहा भक्त को विश्वास, साहस और आत्मिक
शांति प्रदान करता है।
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