लंका काण्ड दोहा (22)

 लंका काण्ड दोहा 22 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

दो0-हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।

अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21।

भावार्थ :

अंगद रावण से कहते हैं—

“तुम्हारे लिए यह सत्य है कि हम अपने कुल का नाश करने वाले हैं और तुम अपने कुल का पालन-पोषण करने वाले हो। क्योंकि अंधे और बहरे भी ऐसा नहीं कह सकते और तुम्हारे तो बीस आँखें और बीस कान हैं; सब कुछ देखकर-सुनकर भी तुम सत्य नहीं समझ रहे हो।”

विस्तृत विवेचन

अंगद के पिता बाली की हत्या भगवान राम ने हीं की थी, इसलिए रावण ने व्यंग्य स्वरूप उसे कुलघाती कहा। परंतु अंगद ने रावण को भगवान राम की शरण में जाने को कहा।

यह दोहा अंगद के निर्भीक, तर्कपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण वचन को प्रकट करता है। अंगद रावण के अहंकार को तोड़ते हुए उसे आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं।

1. “हम कुल घालक, तुम कुल पालक”

अंगद स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि  वे अपने पिता के हत्यारे भगवान राम का साथ दिया दे रहे हैं जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए बाली की हत्या की, जबकि रावण स्वयं को अपने कुल का रक्षक मानता है। यह कथन सत्य पर आधारित है, किंतु इसमें यह संकेत भी है कि रावण अपने कर्तव्य में असफल हो रहा है।

2. “अंधउ बधिर न अस कहहिं”

अंगद व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि रावण अंधा या बहरा नहीं है। वह सब कुछ देख-सुन सकता है, फिर भी सत्य को नहीं स्वीकार कर रहा। यह शारीरिक नहीं, बौद्धिक और नैतिक अंधत्व पर प्रहार है।

3. “नयन कान तव बीस”

रावण के दस सिर होने का संकेत देते हुए कहा गया है कि उसके पास बीस आँखें और बीस कान हैं। इतना ज्ञान-साधन होने पर भी यदि विवेक न जागे, तो वह सब व्यर्थ है। यहाँ तुलसीदास जी यह शिक्षा देते हैं कि अहंकार बुद्धि को नष्ट कर देता है।

मुख्य शिक्षा

यह दोहा सिखाता है कि

केवल शक्ति, विद्या और इंद्रियाँ होना पर्याप्त नहीं है।

विवेक और धर्म का साथ न हो तो मनुष्य सत्य को देखकर भी नहीं देख पाता।

अहंकार मनुष्य को अंधा-बहरा बना देता है, 

चाहे वह कितना ही विद्वान क्यों न हो।

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