लंका काण्ड चौपाई (221-228)

 लंका काण्ड चौपाई 221-228। का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।

जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।।

सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।

भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।।

जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।।

जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।।

जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।।

सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।

भावार्थ

रावण अंगद के सामने अपने बल, पराक्रम और तपस्या का घमंड करता हुआ कहता है—

“हे मूर्ख! सुन, वही रावण हूँ जो अत्यंत बलशाली है। मेरी भुजाओं की लीला से पर्वत तक हिल जाते हैं।

मैं वही हूँ जिसे स्वयं उमापति शिव और देवता जानते हैं। मैंने अपने सिर कमल की भाँति काट-काटकर पुष्प की तरह चढ़ाकर शिव की असंख्य बार पूजा की है।

मेरे भुजबल को दिशाओं के रक्षक देवता और दिग्गज जानते हैं। जब-जब मैं युद्ध करता हूँ, बड़े-बड़े वीर हार जाते हैं।

जिनके भयानक दाँत भी नहीं टूटे, उनके हृदय मेरे प्रहार से जड़ की तरह टूट गए।

मेरे चलने से पृथ्वी डोलने लगती है, जैसे मतवाले हाथी के चढ़ने से छोटी नाव हिल जाए।

ऐसा प्रतापी रावण संसार में प्रसिद्ध है, फिर भी तू झूठी बातें सुना रहा है, जिन्हें मेरे कान सुनने योग्य नहीं मानते।”

विस्तृत विवेचन

यह चौपाई रावण के अहंकार, आत्मप्रशंसा और अज्ञान को अत्यंत सशक्त रूप में प्रकट करती है।

बल और पराक्रम का घमंड

रावण अपने बाहुबल का बखान करता है—पर्वत हिलाना, पृथ्वी डुलाना, दिग्गजों को भयभीत करना। यह दर्शाता है कि वह केवल शारीरिक शक्ति को ही सर्वोच्च मानता है।

तपस्या का दुरुपयोग

शिव की कठोर तपस्या और सिरदान का उल्लेख कर रावण यह जताता है कि वह कितना महान है। परंतु तुलसीदास संकेत देते हैं कि

👉 तप और वर यदि अहंकार से जुड़ जाएँ, तो विनाश का कारण बनते हैं।

धर्मबोध का अभाव

रावण स्वयं को “जग बिदित प्रतापी” कहता है, पर सत्य और नीति की बात सुनने को तैयार नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

अंगद की बात को “अलीक प्रलाप” कहना

यहाँ रावण सत्य को झूठ और उपदेश को अपमान समझ रहा है। यह उसके विवेक-नाश का स्पष्ट संकेत है।

सार-तत्त्व

रावण बल, तप और प्रताप से सम्पन्न होते हुए भी

अहंकार, अधर्म और हठ के कारण पतन की ओर बढ़ रहा है।

तुलसीदास जी इस चौपाई से सिखाते हैं कि

केवल शक्ति नहीं, विनय और धर्म ही मनुष्य को महान बनाते हैं।


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