लंका काण्ड दोहा (23)
लंका काण्ड दोहा 23 का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन करे :
दो0-जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।।
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।।
दोहा 22(क) — भावार्थ
रावण कहता है—
“हे कपि! तू जड़, नीच और मूर्ख है, व्यर्थ बकवास मत कर। मेरे बाहुबल को देख। लोकपालों के समान मेरा बल अपार है। जैसे राहु चन्द्रमा को ग्रसने हेतु सदा तत्पर रहता है, वैसे ही मैं सबको दबाने में समर्थ हूँ।”
विवेचन:
यहाँ रावण का अहंकार, दर्प और आत्ममुग्धता प्रकट होती है। वह अपने बाहुबल की तुलना लोकपालों से करता है और स्वयं को राहु के समान सर्वग्रासी बताता है। राहु का चन्द्रग्रहण रूपक बताता है कि रावण धर्म, मर्यादा और उजास (चन्द्रमा) को निगलने का दंभ रखता है। पर तुलसीदास संकेत देते हैं—राहु का प्रभाव क्षणिक होता है; सत्य और धर्म फिर प्रकाशित होते हैं। यही रावण के पतन का सूचक है।
🔹 दोहा 22(ख) — भावार्थ
रावण आगे कहता है—
“मेरे बाण आकाश में ऐसे फैलते हैं कि वे शत्रु के हाथों (कमलों) पर जाकर टिक जाते हैं। तब मैं शिव सहित कैलास पर विराजमान हंस के समान शोभायमान होता हूँ।”
विवेचन:
यहाँ रावण स्वयं को महान योद्धा और शिवभक्त सिद्ध करने का प्रयास करता है। ‘कमल’ शत्रु के हाथों का संकेत है—अर्थात् वह दावा करता है कि उसके बाण शत्रु को निष्क्रिय कर देते हैं। ‘हंस’ और ‘कैलास’ की उपमा से वह अपनी दिव्यता का भ्रम रचता है। किंतु यह सब आत्म-प्रशंसा है। वास्तविकता में, जो सच में शिवभक्त होता है, उसमें विनय और मर्यादा होती है—जो रावण में नहीं।
🌿 समग्र संदेश
बल का अहंकार विनाश का कारण बनता है।
धर्म और सत्य को राहु समान ढकना संभव है, मिटाना नहीं।
जो स्वयं को शिवभक्त कहे पर मर्यादा त्याग दे—वह भक्ति का ढोंग मात्र है।
तुलसीदास जी इस दोहे में रावण के मुख से ही उसके अंत का बीज दिखा देते हैं।
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